Thursday, 17 November 2011

कहानी-१७


उनकी वापसी

रूपसिंह चन्देल

बस-स्टॉप से उनकी ससुराल सात मील दूर थी. जाने का कोई साधन नहीं था, पैदल के अतिरिक्त. रास्ता ऊबड़-खाबड़ , ऊंचा-नीचा और कहीं-कहीं बेहद धूलभरा. मई की दोपहर और आकाश से टपकते अंगारे. चारों ओर दूर-दूर तक फैले ठुंठियाए खेतों में चेहरे को झुलसा देने वाली गर्म हवा बौखलाई-सी दौड़ रही थी.

सिर को तौलिए से बांधकर मैं एक योद्धा की भांति भुलभुलाई धूल और तपती ऊंची-नीची धरती को नापता हुआ तेजी से कदम घसीटने का प्रयत्न कर रहा था. लू से बचने के लिए पैंट की जेब में प्याज की दो गांठें पत्नी ने ठूंस दी थीं. मैं थोड़ी-थोड़ी देर में बैग से थर्मस निकालकर कुछ घूंट पानी हलक के नीचे उतारता जा रहा था. रास्ता एक गांव के बीच से होकर निकलता था. निपट तपती दोपहरी में वह गांव चौपालों में दुबका-सा पड़ा था.

मन  चाह रहा था कि मैं भी किसी चौपाल में दोपहर गुजार दूं. इजाजत चाहने पर शायद कोई मना भी नहीं करता, लेकिन 'शर्ट' की जेब में पड़ा उनका पत्र उस बात की अनुमति नहीं दे रहा था-- दो वर्षों बाद मिला था. लिखा था, 'पत्र पाते ही चले आओ. मैं घोर संकट में हूं.'

और मैं रात की गाड़ी पकड़कर चल पड़ा था. रातभर ट्रेन में नींद न आ पायी थी. सोचता रहा था उनके बारे में. वे मेरी सगी बहन न थीं. पड़ोस में रहती थीं, अपने ताया के साथ. सीधी-सादी, कम बोलने वाली, प्रतिक्षण काम में लगी रहने वाली . फिर भी ताई-ताया की नजरें उनके प्रति कभी सीधी नहीं रहती थीं. सप्ताह में कम-से कम एक बार उनकी ताई कोई-न कोई बहाना निकालकर उन्हें जब तक पीट न लेतीं, उन्हें चैन न मिलता.

वे दोपहरे में कभी-कभी अपनी ताई-ताया से छिपकर खेलने मेरे घर आ जातीं. हम दोनों तब तक खेलते रहते, जब तक उनकी ताई की कर्कश आवाज हमारे कानों से न टकराती.

"परकासो---- कहां मर गयी करमजली !" उनकी ताई चीखती तो वे सहमकर मेरी मां से चिपट जातीं. मां उन्हें बहुत चाहती थीं. उनके सिर पर हाथ फेरती हुई  कहतीं , "चिन्ता मत कर, बेटी----- मैं तेरी ताई को कह देती हूं कि तू अनु के साथ खेल रही है."

वे तब भी सहमी-सी ही रहतीं. क्योंकि वे जानती थीं कि मां के कहने से उस समय  ताई कुछ नहीं बोलेंगी, लेकिन बाद में उन्हें मारेंगी जरूर. यही नहीं, तीन-चार दिन तक वे खेलने के लिए घर से निकल भी न पाएंगी.

और वही होता. ताई उन्हें किसी-न किसी ऎसे काम में लगा देतीं कि न वह काम खत्म कर पातीं, न निकल ही पातीं. लेकिन जब भी मौका पातीं, सीधे मेरे घर आ पहुंचतीं. पड़ोस में एकमात्र मेरा घर ही था, जहां वे खेलने जातीं. वे बोलतीं कम जरूर थीं, लेकिन हर क्षण मुस्कराती रहती थीं. उम्र में मुझसे चार-पांच साल बड़ी थीं, इसीलिए मैं उन्हें पहले परकासो दीदी और कुछ दिनों बाद केवल दीदी कहने लगा था. मेरे कोई बहन नहीं थी इसलिए उम्र के बढ़ने के साथ-साथ हमारा यह रिश्ता काफी प्रगाढ़ होता गया. आज वे किस संकट में पड़ गई हैं, समझ नहीं पा रहा था.

वैसे संकट उनके साथ बचपन से ही लगे रहे हैं. जब वे बहुत छोटी थीं--- दूध-पीती बच्ची, तब उनके पिता चल बसे थे. मां ताई-ताया की प्रताड़ना सहकर भी उनके साथ रहने के लिए मजबूर थीं, क्योंकि उनके मायके में कोई भी नहीं था. दुधमुंही दीदी को छाती से चिपकाए उनकी मां खेतों में काम करने जाती . उन्हें किसी झाड़ी की छाया में लिटाकर वह दिन भर काम करती रहतीं. मां ने मुझसे बताया था कि नन्ही दीदी पैर चला-चलाकर खेला करतीं ---- झाड़ी पर आ बैठी चिड़ियों से गूं-गा बतियाया करती थीं और जब भूख लगती, चीख-चीखकर मां को बुला लेती थीं.

दीदी मुशिक्ल से पांच-छह साल की हुई थीं कि एक दिन मां भी उन्हें ताई-ताया को सौंपकर पति के पास चली गई. मां के आंखें बन्द करने के तुरन्त बाद ही ताई ने उनके नन्हें कोमल हाथों को लगा दिया था बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने में. अपनी ताकत भर  दीदी बर्तन ठीक से ही मांजती, लेकिन ताई को उनकी सफाई पसन्द न आती और दीदी पर दो चार हाथ पड़ ही जाते. हर दिन दो-चार हाथ खाती हुई ही वे बड़ी हुई---- इतनी बड़ी कि मेरे घर खेलने आना भी बन्द कर दिया. मैं भी आठवीं पास कर हाईस्कूल में पहूंच गया और साइकिल से पांच मील दूर के इण्टर कॉलेज में जाने लगा. दीदी ने खेलने आना तो बन्द कर दिया था, लेकिन मां से मिलने वे प्रायः आ जाया करतीं. कुछ देर बैठतीं और मेरी पढ़ाई के बारे में पूछ लेतीं. उनकी खुद भी पढ़ने की इच्छा रही थी. एकाध बार घर में कहने पर ताया चीखकर बोले थे, "लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज हमारे वंश में नहीं रहा---- तू पढ़कर क्या मुंशीगिरी करेगी.?"

दीदी मन मारकर रह गई थीं.

पढ़ाई की बात चलने पर रुआंसे स्वर में वे कहतीं, "चार अच्छर पढ़ लेती तो चिट्ठी तो लिख सकती थी. लेकिन......"

वे बेहद उदास हो जातीं.

एक दिन मां ने बताया, दीदी की शादी की बात चल रही है. शायद जल्दी ही तय हो जाएगी. मैं उस दिन सोचता रहा---"दीदी अब चली जाएंगी. एकमात्र दीदी--- सगी से भी अधिक , मैं किससे बातें किया करूंगा? किसे दीदी कहा करूंगा?' हमारे यहां आज भी लड़कियों --विशेषकर गांव की लड़कियों की नियति शादी ही है. वह  कभी न कभी होनी ही थी और उन्हें जाना ही था.

दीदी का अब मेरे घर आना लगभग बंद हो गया था. कभी-कभार ही उनके दर्शन हो जाया करते थे. कुछ दिन बाद  वे भी बन्द हो गए. वे पूरी तरह चहारीदीवारी के अन्दर रहने लगीं. कहीं न आने-जाने का उनके ताया का सख्त आदेश था. वे उनकी शादी दूर के गांव में तय कर आए थे--- एक किसान परिवार में . लड़का दोजहा था-- दीदी से पन्द्रह साल बड़ा. इधर-उधर दूसरों से सुनी बातों के आधार पर मां ने बताया था कि पहली पत्नी से शायद उसे एक पांच साल का लड़का भी है. मां दीदी के ताया को हल्की-सी गाली देती हुई भर्राए गले से बोली थीं, "करम फूट गए, उस बे मां-बाप की बच्ची के. बूढ़ा-खूसट बच्ची की जायदाद समेटने के लिए उसे दूर-दराज एक दोजहे के गले मढ़ने जा रहा है."

लेकिन मां के या किसी और के सोचने से दीदी की शादी  टलनी नहीं थी. महीना-तारीख -दिन सब पहले ही निश्चित कर आये थे उनके ताया. और एक दिन आतिशबाजी और बैंडबाजों की आवाज गांव में गूंज उठी थी, जिसने दीदी की सिसकियों को बेरहमी से दबा दिया था. एक काले, बदसूरत-से आदमी के साथ गुलाब-सी सुन्दर दीदी एक-एक कर अग्नि के फेरे लेने लगी थीं---- आजीवन एक सूत्र में बंध जाने के लिए.

दीदी की शादी करके उनसे पूरी तरह से छुट्टी पा ली थी उनके ताया ने. एक प्रकार से भुला ही दिया था उन्हें. उनकी शादी के कुछ दिन बाद ही मैं पढ़ने के लिए शहर चला गया. दो साल तक उनके बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं चला--वे कैसी हैं, सुख में या दुख में! दो साल बाद एक दिन मां को किसी से पता चला कि वे बहुत कष्ट में हैं. पति उन्हें मारता -पीटता और घर से लेकर खेतों तक का काम करवाता है. मां ने उनकी खबर लेने के लिए किसी तरह उनके ताया से पता लेकर उन्हें तीन पत्र लिखवाए. लेकिन उत्तर नहीं आया. 'आता भी कैसे? दीदी पढ़ी-लिखी होतीं तो अवश्य अपने बारे में दो शब्द लिख भेजतीं. लेकिन----' मां कहती और आंखें गीली कर लेतीं.

गर्मी की छुट्टियों में मां ने जिद की उन्हें देख आने को. मुझे जाना पड़ा. भटकता-पूछता किसी प्रकार रेलवे स्टेशन से सात मील की पैदल यात्रा करके पहुंच गया था उनकी ससुराल रहमतपुरा. उस दिन भी निपट दोपहर थी. घर के सारे लोग इधर-उधर जमीन पर ढेर थे, लेकिन दीदी बेझर (जौ-चना) कूटकर साफ करने में व्यस्त थीं पसीने से तर-बतर.

*****

पति से दीदी ने मेरा परिचय दूर के रिश्ते के भाई के रूप में करवाया था. मैं दो दिन रहा था तब. उन दो दिनों में ही बहुत कुछ समझने को मिला था. दीदी ने दुखी स्वर में कहा था, "ताया ने पता नहीं किस जनम का बदला लिया है मुझे यहां ब्याह कर. ये सब कसाई हैं --- निरे कसाई. जरा-जरा सी बात में रुई की तरह धुनने लगते हैं. लड़के को सिर चढ़ा रखा है. वह और मेरे खिलाफ उनके कान भरता रहता है. कई बार तो मन करता है कि किसी कुएं-तालाब में कूद जाऊं----- ." वे और अधिक दुखी हो उठी थीं.

उसके बाद एक-एक कर बारह वर्ष बीत गए. पढ़ाई समाप्त कर मैं नौकरी में आ गया और दिल्ली में पोस्ट हुआ. अपनी शादी में दीदी को लेने गया था. बहुत मिन्नतें करने के बाद उनके पति इस शर्त पर उन्हें भेजने को राजी हुए कि मैं शादी के तुरन्त बाद उन्हें वापस पहुंचा जाऊंगा. दीदी गांव में सबसे मिलीं, बहुतों के घर भी गईं, लेकिन अपने ताया के घर झांकने भी नहीं गईं.

दीदी के प्रति मां का लगाव पहले की अपेक्षा कुछ अधिक ही बढ़ गया था. उनके जाने के बाद मां कई दिनों तक उदास रही थीं यह कहते हुए, "फिर पहुंच गई बेचारी कसाइयों के घर---- कितना दुष्ट है उसका पति---- कहता है बच्चे पैदा करने के लिए तेरे साथ शादी नहीं की. की है अपने सुख और बेटे की देख-भाल के लिए---- भाग फूट गए बच्ची के!"

मेरे दिल्ली वापस लौटते समय मां ने कहा था, "कभी-कभी परकासो के पति को खत लिख दिया कर आदरपूर्वक जिससे उसे यह न लगे कि परकासो को पूछने वाला कोई है ही नहीं. जालिम मूढ़ है उसका पति---- बेटा, जरा सोच-समझकर खत लिखा करना."

और मैं साल में कम से -कम दो पत्र अवश्य लिख देता था---- कभी दीदी के नाम तो कभी उनके पति के नाम. कभी-कभी उनके उत्तर भी आ जाते थे. प्रायः दीदी ही उत्तर लिखवा भेजती थीं, "सरब श्री सर्वोपमा जोग लिखी---- यहां सब राजी-खुशी है. तुम्हारी राजी-खुशी सदा भगवान से नेक मनाया करती हूं---- " से शुरू होकर पत्र में खेत-खलिहान, बाग आदि के समाचार होते और अंत में उर्मिला के लिए ढेर सारा प्यार और आशीष होता.

लेकिन उनका यह पत्र संक्षिप्त और पहले के पत्रों से भिन्न था. और यह मेरे किसी पत्र के उत्तर में नहीं था. वे अवश्य किसी कठिनाई में हैं. मेरे कदम कुछ और तेज हो गए. जूतों के अन्दर तलवे जलने लगे थे, और शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था.

******

दीदी के सिर और हाथ में पट्टियां बंधी थीं. स्पष्ट था कि उनके साथ पशुवत व्यवहार किया गया था. उन्हें देख क्षणांश के लिए मन उत्तेजित हुआ, लेकिन अपनी स्थिति का ज्ञान होते ही शांत हो गया और सोचने लगा, 'हम किस आधार पर यह दावा करते हैं कि स्वतंत्रता के बाद यहां क्रान्तिकारी सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन हुए हैं---- जब कि यहां की सामान्य नारी आज भी दलित है, शोषित है, उपेक्षित और पीडित है.'

शाम को उनके पति से मैंने बात की, "दीदी की तबीयत कुछ खराब लगती है. अगर इज़ाजत दें तो कुछ दिनों के लिए मैं उन्हें दिल्ली ले जाऊं."

मेरी बात सुनते ही वे फट पड़े, "ले जाओ अपनी बदजात बहन को. मैं इसे फूटी आंखों भी नहीं देखना चाहता---- साली जुबान चलाती है."

"तो क्या तुम्हीं को भगवान ने जुबान दी है." खम्भे की ओट से दीदी का स्वर सुनाई पड़ा. मैं स्तम्भित उस ओर देखने लगा. यह आश्चर्यजनक परिवर्तन देख रहा था उनमें. शायद बर्दाश्त की भी कोई सीमा होती है.

"ज्यादा चबर-चबर की तो नटई पर पैर रखकर जुबान खींच लूंगा---- मादर-----कहीं की!" उनके पति क्रोध से कांपने लगे थे.

"जरा हाथ तो चला कर देखो---- अच्छा न होगा."

दीदी विद्रोहियों की भांति तनकर खड़ी हो गई. पति आगे बढ़े, लेकिन मैं बीच में आ गया और उन्हें किसी प्रकार समझाकर बाहर ले गया. वे सिर पर हाथ रखकर बैठ गए और बोले, "भाई, तुम इसे कल सुबह ही ले जाओ. तुमने देख लिया न इसका रंग-ढंग . अगर यह दो -चार दिन यहां और रही तो मैं कुछ अनर्थ कर बैठूंगा."

दीदी तो पहले ही तैयार थीं. बोलीं, "मैं भी अब यहां नहीं रहना चाहती, अनूप. जिन्दगी भर वापस न आने की कसम खाकर जाना चाहती हूं."

अगले दिन चलते समय वे न तो पति से बोलीं और न ही सौतले बेटे से. चुपचाप पिछौरी ओढ़ निकल पड़ी थीं घर से.

दिल्ली आते ही उन्होंने आदत के मुताबिक घर का अधिकांश काम अपने सिर ओढ़ लिया. उर्मिला कुछ अस्वस्थ भी रहती थी---- सातवां महीना चल रहा था उसका. दीदी सुबह नाश्ता बनातीं. पम्मी को उठातीं, स्कूल जाने के लिए तैयार करतीं और उसे बस में चढ़ाने भी जातीं. फिर दोपहर उसे लेने जातीं. उनका आगमन अकस्मात हुआ था, लेकिन इससे उर्मिला को बहुत राहत मिली थी.

और जब उर्मिला ने बेटे को जन्म दिया तो दीदी की खुशी का पारावार न रहा. तीन दिन बाद जब उर्मिला अस्पताल से वापस घर आयी, दीदी ने पड़ोस की औरतों को इकठ्ठा कर लिया.किसी के यहां से ढोलक भी मांग लायी थीं और ढोलक पर उनके सोहर बजने लगे थे---

"हुए मेरी जान लौकुश बन में हुए,
जो घर होती सास कौसिल्या--------"

उन्होंनें उर्मिला को चार महीने तक काम छूने नहीं दिया. कहतीं, "तुम्हारा काम सिर्फ मुन्ने को सम्भालना है."

पम्मी उनसे इतना हिल गई कि उनसे ही खाना खाती और उन्हीं के पास सोती.

दीदी को आए लगभग दस महीने बीत गए थे. एक दिन पत्र आया, उनके सौतले बेटे का मेरे नाम. लिखा था, "बापू सख्त बीमार हैं---- हालत अच्छी नहीं है."

दीदी उस समय पम्मी के साथ 'अक्कड़-बक्कड़ बम्बे भो---- 'खेल रही थीं. पत्र हाथ में देख पूछ बैठीं, "कहां से आया है?"

"आपकी ससुराल से." मैंने कहा और पढ़कर उन्हें सुना दिया. सुनते ही उनके चहरे पर उदासी की पर्त जम गई. बिना कुछ कहे वे किचन में चली गईं. पम्मी उनके पीछे-पीछे जा पहुंची, "बुआ, आप मुझसे नालाज हो गईं?"

"नही बेटे, तुम चलो, मैं अभी आती हूं."

थोड़ी देर बाद वे वापस आयीं तो मुझे लगा जैसे वे किचन में कुछ काम करने के बाहने रोती रही हैं.

रात में उन्होंने तबीयत ठीक न होने का बहाना कर खाना नहीं खाया. आधी रात के बाद अचानक नींद खुलने पर मुझे दीदी के कमरे से सिसकने की आवाज सुनाई दी, लेकिन उसे भ्रम समझकर मैं फिर सो गया.

सुबह नियमपूर्वक उठकर उन्होंने पम्मी को तैयार कर स्कूल भेज दिया. उर्मिला को नाश्ता दिया और मेरा नाश्ता लेकर मेरे पास आ बैठीं. मैं नाश्ता करता रहा और वे मेरे चेहरे की ओर रह-रहकर देखती रहीं. क्षण भर बाद मैंने पूछ ही लिया, "दीदी, आप कुछ----."

"हां, अनूप---- मैं कुछ कहना चाह रही थी----."

"हां-हां, कहो न!"

"तुम आज रात की गाड़ी से मुझे वहा पहुंचा दो."

"क्या कह रही हैं आप? आपने तो वहां कभी----"

मैं आगे कुछ कहता इससे पहले ही वे बोलीं, "अनूप, वे हृदयहीन हैं और हो सकते हैं, लेकिन मैं तो नहीं------ अगर उन्हें कुछ हो गया तो----- नहीं, अनूप, वे सारी बातें गुस्से के साथ ही खत्म हो गईं." उनकी आंखें गीली हो आयी थीं.

मैं विस्मित उनके चेहरे की ओर देखता रह गया.

(यह कहानी १९८३ में कभी लिखी गई थी और १९८४ में ’साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के किसी अंक में प्रकाशित हुई थी)
*****
’आदमखोर तथा अन्य कहानियां’ (१९९०)

Wednesday, 16 November 2011

कहानी-१६

आदमखोर
रूपसिंह चन्देल
(यह कहानी हंस के मई 1987 अंक में प्रकाशित हुई थी)
भूरे - काले बादलों का समूह अचानक पश्चिमी क्षितिज में उभरने लगा। सरजुआ के हाथ रुक गये। हंसिया नीचे रखकर वह ऊपर की ओर देखने लगा। हवा का बहाव तेज होता जा रहा था। भूरे बादलों के छोटे-छोटे द्वीप आसमान में तैरते हुए पूरब की ओर बढ़ने लगे। चीलों और कौओं के झुण्ड पंख फैलाए हवा के बहाव को चीरने की कोशिश करते पश्चिम की ओर बढ़ रहे थे।

"बेमौसम ई का करि रहे हौ भगवान!" आंखें फाड़कर निहारता हुआ सरजुआ बुदबुदाया और सिर पर अंगोछा लपेटकर काटी हुई पतावर समेटकर पूरे(गट्ठर) बांधने लगा।

बहुत सवेरे ही आकर वह इस काम में जुट गया था। तब से नाले के किनारे के खेतों , मेड़ों और उसके नीचे की सारी पतावर वह काट चुका था। वह अनुमान लगाने लगा कि कम-से कम पचास गट्ठर यानी कि दस बोझ पतावर वह अब तक काट चुका होगा। लेकिन काटते समय उसे क्या मालूम था कि मौसम इस तरह का रुख अख्तियार कर लेगा, नहीं तो काटने के साथ ही वह गट्ठर भी बांधता जाता। उसने फिर ऊपर की ओर देखा। बादलों के द्वीप नदारद थे। मटियायी धुन्ध तेजी से फैलती जा रही थी। हवा बेरहम-सी पेड़ों को झकझोरती सांय-सांय करती खेतों में खड़ी फसल को रौंदती लहराने लगी थी।

"यो आंधी तूफान पता नहीं का कहर ढाई!" वह बुदबुदाया और फिर पतावर समेटने लगा।

"लागत है इहौ साल झोंपड़िया मा छपरा न पड़ि पायी।" वह फिर बुदबुदाया और उड़ती पतावर के पीछे दौड़ा।

तीन साल पहले इनसे-उनसे मांग-मूंगकर उसने अपनी झोंपड़ी पर छप्पर डाला था। पिछले साल की बारिस में वह कई जगह से टपकने लगा। उसने रामदीन से पुआल मांग कर उसके ऊपर डाला, लेकिन पानी का टपकना बन्द नहीं हुआ। रात-रात भर उसके बीवी-बच्चों का सोना हराम हो गया। जिस कोने में वे सिमट-सिकुड़कर लेटते, छप्पर वहीं से टपकने लगता। कोठरी पहले से ही जर्जर थी इसलिए वह पिछ्ले कई सालों से पूरी बरसात छप्पर के नीचे ही काटता आ रहा था। कितनी ही बार उसने कोठरी बनवाने की जुगत बैठाई, मजूरी-धतूरी करके कुछ पैसे भी इकट्ठे किए, लेकिन जब भी काम शुरू करवाना चाहा, रमेसर सिंह को पता नहीं कैसे भनक लग जाती और वह उसका गला आ दबोचते। सारी जमा-पूंजी हड़प ले जाते और जाते-जाते कहते, "यह तो सूद भर है --- सूद--- तेरे बाप रमजुआ ने जो करजा लिया था उसका।"

वह हाथ मलकर रह जाता अवश-उदास। कितना कर्ज लिया था उसके बाप ने यह बिना बताए ही सालों सूद वसूल करते रहे थे रमेसर सिंह । लेकिन एक बार उसने दबी जुबान पूछ ही लिया, तो बही खाता उसके सामने फैलाकर शब्दों का गला मरोड़ते हुए वह बोले, "तू खुद ही देख ले न अपनी आंखों से कितना लिया था तेरे बाप ने---- एक-एक पाई-पैसा इसमें दर्ज है। अरे स्साले--- हाड़-चोर---- तू समझता है मैं झूठ ही तुझसे वसूल कर रहा हूं।"

वह मटमैले कागज पर गुदे नीले-नीले लफ्जों को बिटर-बिटर ताकता भर रहा था, जिसके नीचे स्याही से एक अंगूठा निशान लगाया गया था और पास ही कुछ लिखा भी था।

"करिया अच्छर भैंस बरोबर हूं लम्बरदार---- आप जो लिखा होइहो, हम ओहका झूठ थोड़े ही कहत हन । पर----।"

"पर क्या---- झूठ भी नहीं समझता और हिसाब भी देखने चला है", हुक्का गुड़गुड़ाकर धुंआ उसकी ओर फेंकते हुए रमेसर सिंह फिर बोले, "साल में एक बार सूद मांगता हूं वह तो तुझसे दिया नहीं जाता---- मेरे यहां काम करना तुझे रास नहीं आता---- ठेकेदार के सहलाने में ज्यादा मजा आता है न ----स्साला सराफत का जमाना नहीं रहा।" उन्होंने फिर हुक्का गुड़गुड़ाया और इस बार धुंआ सरजुआ के ठीक मुंह के सामने उगल दिया। उसकी आंखों में कड़वाहट भर गई। खांसी आ गई तो अगोंछे से मुह-आंखें ढक वह दो कदम पीछे हट गया।

"तूने मुझ पर शक किया है, इसलिए अब तू भी कान खोलकर सुन ले सरजू---- एक साल के अन्दर रुपयों का इन्तजाम करना होगा तुझे---- पूरे एक हजार हैं।"

अंगोछा हटाकर पनियायी आंखों से सरजुआ ने उनकी ओर देखा।

"सुन लिया न ---- अब भाग यहां से!" रमेसर सिंह बही-खाता संभाल पलंग से उठ खड़े हुए तो वह भी मुड़ पड़ा। लेकिन उनकी आवाज सुनकर रुक गया। कुछ नरम आवाज में वह कह रहे थे, "देख, तेरी भलाई के लिए ही कर रहा हूं सरजू, ठेकेदार के चक्कर में मत पड़। रेलवे का ठेका जिन्दगीभर नहीं चलेगा---- मेरे यहां आ जा। कर्ज भी उतरता रहेगा और तेरा घर भी चलता रहेगा।---- जल्दी नहीं है। अगली फसल से सही। इससे पहले जब भी तुझे कभी किसी बात की चाहत हो बेहिचक कहना----- अरे, तेरे बाप ने जो मेरी सेवा की थी, उसे मैं भूला थोड़ी ही हूं---- मुझे कभी पराया मत समझना।"

वह बिना कोई उत्तर दिए चला आया और सोचता रहा था, कितना खतरनाक आदमी है यह जो मारता भी है और रोने भी नहीं देता। इसीलिए छप्पर छाने की समस्या जब इस बार भी उसके सामने आ उपस्थित हुई तब रमेसर सिंह की उस दिन की बात का सूत्र पकड़े वह उनके पास जा पहुंचा, नाले के किनारे के उनके खेतों की पतावर के लिए। सुनकर वह बोले थे, "तिहाई में काट ले---- तिहाई माने एक हिस्सा तेरा और दो हिस्से मेरे।"

वह चुप रहा, क्योंकि सौदा घाटे का लग रहा था। वह तो आधे की उम्मीद लेकर आया था।

"सोच क्या रहा है, कल से ही शुरू हो जा न । इतनी पतावर है कि तिहाई में नुझे इतनी मिल जायेगी कि तेरा घर भी छा जायेगा और तू बेच भी लेगा।"

"अच्छा, लम्बरदार!" वह केवल इतना कहकर उठ आया था।
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किसी तरह वह पांच गट्ठर पतावर ही इकट्ठा कर बांध पाया, शेष उस भयंकर आंधी की चपेट में आकर उड़ गयी। पांच बांधे गट्ठर भी उड़ गये होते यदि वह उन्हें इकट्ठ कर उनके ऊपर बैठ न गया होता। आंधी इतनी तेज थी कि एक बार उसे लगा जैसे गट्ठरों सहित वह भी उड़ जायेगा। दिन भर के परिश्रम की उस शेष बची पूंजी को बचाने के लिए वह उन पर पसर गया और दोनों हाथों से मजबूती से पकड़ लिया। लगभग आधा घंटे के ताण्डव के बाद आंधी धीमी हुई। उसने ऊपर देखा, आसमान में कालिख-सी पुत गयी थी। अभी शाम होने में काफी समय शेष था, लेकिन अंधेरा पूरी तरह उतर आया था। पगडंडी के पास खड़ा नीम का पेड़ दूर से उसे दैत्य के समान दिखाई दे रहा था।

"हे ईसवर, अब का करि रहे हो। हम गरीबन पर तो तनिक दया करौ भगवान! वैसेई म्हारि दिन भर की मेहनत अकारथ हुई गई---- छप्पर छाउब तो दूर, लागत है आज झोंपड़िया सही-सलामत न बची।" वह बुदबुदात हुआ उठा।

आंधी का प्रभाव काफी कम हो गया था, लेकिन हवा फिर भी चल रही थी और उसमें ठंड का असर बढ़ गया था। हालांकि उसने जगह-जगह से पैबन्द लगा कोट अपने शरीर पर लटका रखा था, जिसे आठ साल पहले धन्नू पंडित ने तब दिया था, जब उसने पन्द्रह दिनों तक उनके यहां इस उम्मीद से काम किया था कि जो मजूरी मिलेगी, उससे वह अपनी बीमार बेटी का इलाज करवायेगा। बिटिया लगभग एक महीने से बीमार चल रही थी। पैसों के लिए उसने पूरे गांव में चक्कर लगाए थे। सबने जब टका-सा जवब दे दिया और रमेसर सिंह ने दुत्कार कर भगा दिया तब हारकर वह दूसरे सूदखोर धन्नू पंडित की शरण में गया था। और धन्नू पंडित ने उसकी मजबूरी का भरपूर फायदा उठाया था। बोले थे, "पैसे तो अभी हैं नहीं---- तू कुछ दिन काम कर, तब तक मैं जुगाड़ बना दूंगा।"

वह पन्द्रह दिनों तक दिन-रात उनके यहां खटता रहा और बिटिया घर में बिना इलाज तड़पती रही थी। हर रोज धन्नू पंडित उसे आश्वासन देते कि कल पैसे जरूर दे देंगे, लेकिन कल अगले कल पर टल जाता। आखिर पन्द्रह दिन बीतते-बीतते उसका धैर्य टूट गया तो दबी जुबान वह बोला, "पंडित जू, बिटेवा बिना इलाज मर रही है---- अगर आप पैसन का इन्तिजाम करि देते तो----।"
उसकी बात पूरी होने से पहले ही धन्नू पंडित चीखे थे, "स्साले मैं कोई बेईमान हूं---- भाग जा यहां से---- नहीं दूंगा पैसे-वैसे----।"

वह भौंचक उन्हें देखता रह गया था। पैरों के नीचे से जमीन खिसकती-सी लगी थी। वह गिड़गिड़ा उठा था, "पंडित जू, किरिपा करि कै----।"

कुछ क्षण तक खा जाने वाली आंखों से उसे घूरते रहे थे धन्नू पंडित फिर घर के अन्दर लपकते हुए गये थे और पुराना-सा वह कोट उसके ऊपर फेंक दिया था, "ले, ले जा इसे----चल फुट मादर----।"

"लेकिन पंडित जू, हम इहका का करिब---- हमै तो बिटेवा के इलाज खातिर----।"

"इसे बेच दे किसी को, पैसे मिल जायेंगे।"

"पंडित जू------।" वह फिर गिड़गिड़ा उठा।

"तेरी मां ---- की ----स्साला बकवास करता है।"

वह कोट थामे भाग खड़ा हुआ था विवश - उदास। कोट खरीदने के लिए उसने कई लोगों से कहा, लेकिन सबने यही कहा, "किसी मुरदे से उतारा ई कोट कौन खरीदे।"

सारे गांव में वह भटका, लेकिन किसी ने कोट नहीं खरीदा और एक दिन बिटिया बिना इलाज के चल बसी। उसने चाहा कि वह उस कोट को फेंक दे, लेकिन फेंक न सका। बिटेवा को तो न बचा सका , लेकिन सर्दी से अपने शरीर की बचत वह उस कोट से करने लगा था।

"सब गरीबन का खून चूसैं वाले रकत पायी गुण्डे -बदमाश हैं---- चाहे रमेसर सिंह हों, धन्नू पंडित या कि ठेकेदार-----" उसने पांच गट्ठरों को पतावर का लंबा जूना बनाकर एक साथ बांधकर बोझ तैयार कर लिया और बैठकर दाएं पैर से धक्का मारकर उसे सिर पर रखना चाहा, लेकिन संतुलन बिगड़ गया। बोझ एक ओर और वह दूसरी ओर लुढ़क गये। तभी आसमान में बादलों की चीत्कार सुनाई पड़ी । वह सहम गया। जल्दी से उठकर बोझ को संभालने लगा। इस बार किसी तरह बोझ सिर पर आ गया। वह सरपट पगडंडी की ओर भागा, लेकिन नीम के पेड़ के पास पहुंचते-पहुंचते आसमान की कालिख झरने लगी। मोटे-मोटे बूंद पड़पड़ाने लगे। बारिस इतनी तेज थी कि एक कदम भी आगे बढ़ना कठिन था। नीम के पेड़ के नीचे बोझ पटक वह तने से सटकर बैठ गया। तभी उसे किसी के कंपकंपाने और दांत कटकटाते हुए 'हू-हू' करने की आवाज सुनाई पड़ी। उसने घूमकर देखा, तो दंग रह गया। रमेसर सिंह उकड़ूं बैठे कांप रहे थे।

"लम्बरदार, आप----?" साश्चर्य उसने पूछा।

"कौ---कौ----कौन---?"

"मैं हूं सरजू, लम्बरदर!"

"स----स----स---र----जू----ग----ग-----जब-----ठण्ड ----है----। लगता है----प्राण निकल----जायेंगे।" किसी प्रकार रमेसर सिंह कह पाये।

सरजुआ चुप रहा। रमेसर सिंह को कांपता-दांत किटकिटाता देख उसे अच्छा लग रहा था। "----बूढ़ा----खूसट----खूब गरीबन का खून चूसा है तैने---- अब कहां गई ऊ हेकड़ी----।" वह मन-ही मन बुदबुदाया।

"क्या----करने आया था रे यहां?"

"आपै ते तो पूछा रही लम्बरदार पतावर खातिर। आज सुब्बो से वही काटित रही।"

"ओह----ठीक है --- ठीक है। हे भगवान--- फसल तो सब सत्तानास हो गई। लागत है पत्थर गिरी----।"

सरजुआ फिर चुप रहा। इस समय उसके दिमाग में एक बात घूमने लगी थी, "आज मौका अच्छा है, क्यों न इस पापी को ठिकाने लगा दिया जाय। क्यों न अपने बापू के साथ किए गए इसके अत्याचार का बदला चुका ले।"

एकाएक उसकी आंखों के सामने अपने बापू की मौत का दृश्य घूम गया। वह जेठ माह की तपती एक दोपहर थी। सूरज आग उगल रहा था। बाहर लपटें-सी उठ रही थीं और कोठरी के भीतर भट्ठी सुलग रही थी। उसका बापू झिंगला खटोली पर पड़ा तड़प रहा था वह और मोहल्ले के लोग अवश-उदास नजरों से तिल-तिल समाप्त हो रहे उसे देख रहे थे। और बापू की मौत के लिए जिम्मेदार रमेसर सिंह इस समय उसके पास बैठे ठंड से थरथरा रहे थे।

***

रमेसर सिंह के यहां ही उसका बापू एक प्रकार से बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहा था। यह सब उसके बापू को विरासत में मिला था। उसे अपने बाप से यानी उसके बाबा से। उसका बाबा भी रमेसर सिंह के बापू की हलवाही में था और मरते समय हल की मुठिया अपने बेटे रमजुआ को पकड़ा गया था। एक बार पकड़ी हल की मुठिया उसके बापू के हाथों से तभी छूटी जब वह उनके अत्याचार का शिकार होकर उसे अकेला छोड़कर चला गया। वह हताश- हतबुद्धि कुछ न कर पाया था उस आदमी के खिलाफ, जिसने सुलगती रात में महुए की शराब उतारने के लिए उसके बापू को मजबूर किया था।

महुए की कच्ची शराब उतारकर बेचना रमेसर सिंह का वर्षों पुराना धन्धा रहा है, जो पुलिस की मिली-भगत से आज भी बदस्तूर जारी है। उस रात भी सड़े महुओं से शराब उतारी जानी थी। इस काम में उसके बापू को ही लगाया जाता था। उस दिन उसकी तबीयत ठीक न थी। बुखार से उसका बदन तप रहा था। उसने जाने से इनकार कर दिया, लेकिन रमेसर सिंह के लठैतों के सामने उसकी एक न चली । वे उसके बापू को जबर्दस्ती घसीट ले गये। वहां पहुंचकर बापू ने रमेसर सिंह के सामने हाथ जोड़ दिए, "मालिक, बुखार के मारे चक्कर आ रहा है। काम न करि पाउब सरकार।"

"महुओं की गंधाहट पा के तेरा बुखार एक मिनट में रफूचक्कर हो जायेगा।" होंठ चबाकर बोले थे रमेसर सिंह और जानवरों के बांधे जाने वाले बाड़े की ओर धकियाने लगे थे उसे।

"मालिक मोहते न होई---- मोहका----।" उसका बापू गिड़गिड़ा उठा था।

"देखता हूं साले, कैसे नहीं होता…।" रमेसर सिंह ने अपने एक लठैत से लाठी छीनकर छः-सात लाठियां बापू की पीठ पर जमा दी थीं। औंधे मुंह गिरकर बेहोश हो गया था उसका बापू और जब होश आया तब वह उस कोठरी में था जिसमें शराब उतारी जाती थी। सामने उसके रमेसर सिंह खड़े थे और कह रहे थे, "अब रात-भर यहां से हिलने का नाम न लेना वर्ना---- अच्छा न होगा।"

रात-भर बुखार में तपकर भी बापू काम करता रहा था और सबेरे घर आते ही औंधा मुंह खटोली पर ढह गया था। एक के बाद एक कितनी ही उल्टियां और फिर दस्त शुरू हो गये थे उसे। कुछ ही घंटों में शरीर पीले पत्ते की तरह हो गया था, जैसे खून की एक-एक बूंद निचुड़ गयी हो। मौत मुंह फैलाए उसके बापू को निगलने के लिए क्षण-प्रतिक्षण आगे बढ़ती जा रही थी और वह मौत को परे धकेलने के लिए उपाय सोच रहा था। पैसे एक भी न थे उसके पास। मोहल्लेवाले भी उसी की तरह थे। उनसे मांगना बेकार था। गांव में और किसी से भी उम्मीद न थी उसे कुछ मिलने की , क्योंकि उसका बापू रमेसर सिंह के यहां काम करता था और उसकी मदद करके कोई भी गांववाला रमेसर सिंह से दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहता । कम-से कम उस समय तो नहीं ही और वह रमेसर सिंह की शक्ल भी नहीं देखना चाहता था। उसे घृणा हो गयी थी उनसे।

"कहां से इन्तजाम करे पैसों का!" वह सोचता ही रह गया था और मौत उसके बापू पर अपने पंजे गड़ा चुकी थी। वह रह गया था अकेला---- बेहद अकेला---- रोता-बिलखता----। तभी उसके आंसू पोंछने दौड़े आए थे रमेसर सिंह, सांत्वना के मरहम से उसके घाव को भरने के लिए। वक्त जरूरत पर मदद करते रहने के आश्वासनों की झोली खोल दी थी उन्होंने उसके सामने । और वह उनसे घृणा करता हुआ न चाहकर भी गाहे-बगाहे मदद लेने के लिए मजबूर होता रहा। लेकिन उनके बहुत कहने के बाद भी वह उनकी हलवाही करने नहीं गया।

***

"आज से अच्छा मौका कब मिलेगा सरजू---- दबा दे इसका टेंटुआ---- बड़ी शान्ति मिलेगी बापू की आत्मा को। कौन जानेगा कैसे मरा ---- दुनिया समझेगी पानी और ठंड से मर गया होगा।" उसके हाथ रमेसर सिंह की गर्दन की ओर बढ़ने लगे।

"क---क---का है रे?" कंपकंपाई आवाज में रमेसर सिंह बोले तो उसने अपने हाथ सिकोड़ लिए।

"कुछ नहीं लम्बरदार---- सरदी बहुत है।" वह बोला, फिर मन-ही मन सोचने लगा, 'पापी कितना चौकन्ना है!'

बूंदों की धार के साथ छोटे-छोटे ओले पड़ने लगे । सरजुआ के ठीक ऊपर एक डाल थी इसलिए उस पर  बहुत असर नहीं हुआ, लेकिन रमेसर सिंह के सिर पर चार-छः ओले आ गिरे तो वह चीख उठे, "हाय मर गया रे---- हाय-हाय सिर फट गया----।"

"इधर आ जाओ लंबरदार----।" सरजुआ ने उन्हें अपने निकट खींच लिया। वहां भी कुछ ओले छिटककर उनके आ लगे। वह फिर चीखे, "सरजुआ, यहां भी बचना मुश्किल है। देख ये ओले---।" रमेसर सिंह ने कुछ ओले उसके सामने बढ़ा दिए।

"लम्बरदार एकै उपाय है। आप हमार यो कोट सिर पर डारि लेव---- साइद कुछ बचत हुई जाय।"

"ला रे---- जल्दी ला---- नहीं तो यो सिर सही-सलामत न बची।"

सरजुआ ने थेगलिहे और सालों से अनधुले कोट से रमेसर सिंह का सिर ढक दिया। उनको कुछ राहत मिली। सरजू के बदन में अब केवल फटा कुर्ता रह गया था और ठंड थी कि हड्डियां भेदकर अन्दर घुसी जा रही थी। दोनों टांगें हाथों से बांधकर वह उकड़ूं बैठ गया। उसके दिमाग में फिर भूचाल उठा रमेसर सिंह का गला घोंट देने के लिए। वह सर्दी भूल गया और सोचने लगा कैसे रमेसर सिंह के गले में पंजा फंसायेगा, कैसे धीरे-धीरे दबायेगा और जब वह गिड़गिड़ाने लगेंगे तब वह ठहाका मारकर हंसेगा। रमेसर सिंह को तड़पता देखकर मन की आग को कुछ तो शान्ति मिलेगी।

उसने टांगों को घेरे हाथों को छुटाना चाहा। लेकिन हाथ थे कि ठंड में जम-से गये थे। उसने बहुत कोशिश की कि हाथ दोबारा चैतन्य होकर अपना काम शुरू कर दें, लेकिन वे तो चुंबक की तरह टांगों से चिपक कर रह गये थे। एक बार थोड़ी-सी जकड़न कमजोर हुई तो लगा जैसे हवा का तीर पसलियों में घुसने लगा है। उसने फिर टांगें छाती से चिपका लीं और हाथ कस लिए।

तभी उसे रमेसर सिंह की आवाज सुनाई पड़ी, 'ओरे सरजुआ, देख तो अब ओला-पानी थम गया है---- किसी तरह घर पहुंचना चाहिए।"

रमेसर सिंह का टेंटुआ दबा देने की उसकी योजना धराशायी हो गयी। ओला-पानी सचमुच बन्द हो चुके थे। उसने देखा, रमेसर सिंह उठ खड़े हुए थे। वह भी उठने का प्रयत्न करने लगा, लेकिन उठ न सका। लगा जैसे शरीर जम-सा गया है।

"क्यों रे कितने पूरे काट पाया था पतावर के?"

"होंगे कोई पचास, लेकिन-----।"

"लेकिन क्या रे?"

"पचास में से कुल पांच ही बांध पावा रही ----- ओ रहा उनका बोझ---- बाकी सारी पतावर आंधी मा उड़ि गई है, ठाकुर साहब।"

"उड़ गयी----? उड़ गयी तो भोगना स्साले हरजाना----" रमेसर सिंह के स्वर में क्रोध स्पष्ट था, "तूने न काटी होती तो काहे को बरबादी होती---- मैं कुछ नहीं जानता।"

"इह मा म्हार का दोष, ठाकुर साहब।" सरजुआ हतप्रभ उनकी ओर देखने लगा।

"तो मेरा दोष है?---- भाग स्साले।" रमेसर सिंह ने एक लात उसके हुमक कर मारी तो वह गिरते-गिरते बचा।

"ले---- सौ रुपये तुझ पर और चढ़ गये करज के---- हो गये अब पूरे ग्यारह सौ।" कोट उसके मुंह पर फेंक रमेसर सिंह पगडण्डी पर उतर गये।

सरजुआ की आंखों में सैकड़ों बिजलियां एक साथ कौंध गयी। मुट्ठियां भिंच गयीं और वह उठ खड़ा हुआ।

"आदमखोर----जिनावर----।" वह चीखा और उछलकर पगडण्डी पर आ गया।
 ******
'आदमखोर तथा अन्य कहानियां' (1990)

Tuesday, 15 November 2011

कहानी-१५


उनका नर्क

रूपसिंह चन्देल

नाबदान के पास पहुंचकर उनकी कांपती टांगे ठिठक गयीं. गली में दूर तक पानी इकट्ठा हो गया था. बरसात थमे काफी देर हो चुकी थी, लेकिन छत और आंगन का पानी भक-भक की आवाज के साथ अभी भी नाबदान की मोरी के रास्ते गली में आ रहा था. उन्होंने हाथ के डंडे से गली में रखी ईंटों को टटोला, जो पानी में छुप चुकी थीं. किसी ईंट से डंडा दो बार टकराया, लेकिन वे ईंटों की स्थिति का सही अनुमान न लगा सकीं. किंकर्तव्यविमूढ़-सी वे खड़ी रहीं सोचती हुई -- 'कैसे पार कर सकेगीं उस कीचड़ सने बदबूदार पानी को, -- टांगें  आगे बढ़ने से जवाब दे रही थीं. हाथ कांप रहे थे. उनकी बूढ़ी आंखों में दयनीयता तैर गयी---- कोई उधर दिखाई भी नहीं पड़ रहा जिसकी चिरौरी करके वे उस गंधैले समुद्र को पार कर लेतीं--- कब तक खड़ी रहेगीं."

उत्तरी क्षितिज की ओर बादल चिंघाड़ उठे. उन्होंने आसमान की छाती पर मन्द ज्योति नेत्र टिका दिए. बादलों के समूह अठखेलियां-सी कर रहे थे.

'बारिस फिर होगी' सोचकर उन्होंने फिर डंडे से ईंटों की टोह ली. ये ईंटें वहां बारहो महीने रखी रहती हैं, गली से गुजरने वालों की सुविधा के लिए. क्योंकि नाबदान का पानी हर मौसम में निर्धारित सीमा को पार कर बदबूदार भभकों के साथ गली में आवारागर्दी करने के लिए निकल आया करता है. यह नाबदान भी उन्हीं का है. उन्होंने कितनी ही बार बेटे से कहा कि वह भलीभांति नाबदान बनवा दे, लेकिन अब कौन सुनता है उनकी बातें! न बेटा -- न पोते--.

अचानक मोटी बूंदें कंकड़ की तरह झीनी-पुरानी धोती को भेदती शरीर से टकराईं तो वे हड़बड़ा-सी गयीं. सारा शरीर कांप उठा. वहां रुकना व्यर्थ समझ वे पानी में धंस गयीं. घुटनों से ऊपर था पानी. धोती भीग गयी. लेकिन वे धीरे-धीरे खभर-खभर आगे बढ़ती रहीं डंडे के सहारे. अन्दर रखी ईंटों से कई बार पैर टकराये. सूखी हड्डियां सीत्कार कर उठीं . पड़ोसी मकान की दीवार का सहारा लेकर खड़ी न रह जातीं तो जल-समाधि निश्चित थी.

बारिस फिर शुरू हो चुकी थी. किसी प्रकार पानी पार कर भीगती हुई वे चौपाल तक पहुंची तो शरीर में सैकड़ों सुइयां-सी चुभती महसूस हुईं. गीली धोती बदलना आवश्यक था. लेकिन तेजी से घर के अन्दर जाने के लिए बढ़ते कदम पुत्रवधू की आवाज सुनकर दरवाजे पर ही ठिठक गए.

"कब की गई हुई हैं--- गप-सड़ाके से ही फुरसत नहीं--- दोपहर होने को आई--- घर के सारे काम----बर्तन तक पड़े हैं--- खाना कब बनेगा ?"

"मोहल्ले में ही गई हैं रामलाल के यहां--- उनकी बहू बीमार है--- उसे देखने--- आती ही होंगी--- तुम नाहक---." बेटा आगे कुछ और कहना चाह रहा था कि पुत्रवधू ने झिड़क दिया.

"तुम चुप रहो जी---- तुम्हें क्या--- एक दिन खाना नहीं मिलेगा तब दिमाग ठिकाने लग जाएगा--- बाप-बेटों के."

वे चौपाल में ही दीवार का सहारा लेकर बैठ गयीं. गीली धोती बदन से चिपक गयी थी. हल्की-हल्की ठिठुरन महसूस हो रही थी.. लेकिन इस अनुभूति से दूर उनका मन अतीत की अतल गहराइयों में डूब गया था.

******

जब वे इस घर में ब्याहकर आयी थीं तब यह जन-धन से हरा-भरा था. अठारह बारस की थीं वे अल्हड़ दुनियादारी से अनभिज्ञ. अल्हड़ता उन्हें उस माटी से मिली थी, जहां उनके अठारह वर्ष बीते थे. बांदा के एक छोटे से गांव की थीं वे, जो यमुना की कगार पर बसा है. लेकिन वह अल्हड़ता कुछ ही दिनों में पानी में उठे बुलबुलों की भांति धीरे-धीरे गायब होती चली गयी थी. उसके स्थान पर घर के प्रति जिम्मेदारियों का अहसास गहन होता चला गया था.

यह अकारण नहीं था. घर में वे अकेली ही थीं. सास-ननद थीं नहीं. पति, तीन देवरों और वृद्ध श्वसुर के मध्य एक मात्र वे ही थीं, जिन्हें सबकी सुख-सुविधा का ख्याल रखना था. घर में सब कुछ होते हुए भी वे मुंह बोलने के लिए एक नारी स्वर के लिए तरस-तरस जाती थीं. दिन में जब सभी पुरुष खेतों की ओर मुंह कर लेते, लम्बे-चौड़े घर की ऊंची दीवारें खुली कोठरियां उनको काटने  दौड़तीं. वे दिन भर अपने को अनाज कूटने, पछोरने और पीसने में व्यस्त रखतीं, फिर भी प्रतिक्षण घबड़ाहट का सांप अन्दर ऎंठता ही रहता. लेकिन दो वर्षों बाद बेटे जगदीश के रूप में जब आंगन में किलकारियां गूंजने लगीं तब उनके दिन आसान हो गए थे.

वे उस घर की पहली और अन्तिम बहू बनकर रह गयी थीं उन दिनों. देवरों की शादियां हुई नहीं. जगदीश के पैदा होने के कुछ दिनों बाद श्वसुर चल बसे थे. वे उस घर को स्वर्ग बनाने में जुट गयीं थीं. लेकिन उनके कर्मनिष्ठ और लगन से सजाए गए उस गृह-कानन को एक दिन वक्त के झंझावात ने धराशायी कर दिया था. जगदीश अभी चार साल का भी न हुआ था कि पति ने आंखें मूंद लीं. आपदाओं के शिलाखण्ड ढहने लगे. ऎसे अवसरों में प्रकृति का क्रूर रूप भी दर्शनीय होता है. उनकी गीली आंखें अभी सूख भी न पायी थीं कि बादलों की उमड़-घुमड़ से दिल कांप उठा. रातभर ओलावृष्टि होती रही. खलिहान आने को मचलती सूखी बालियां ओलों के नीचे समाधिस्थ होकर रह गयीं थीं.

उनकी आंखें सूख गयीं. व्यथा को ह्रदय के कोटरों में दबा वे उदास-व्यथित देवरों को समझाने लगीं. स्वयं टूटकर भी उनको टूटने से बचाने के लिए वे बाह्य रूप से चेहरे पर सामान्यता का लेप चढ़ाये रहतीं. उन्हें जगदीश के भविष्य की चिन्ता थी और अब तो देवरों का ही सहारा था. उनको समझा-बुझाकर बांधकर रखना नितान्त आवश्यक था. वे उन्हें मां का स्नेह देतीं तो वे श्रद्दावनत हो उनकी बातें सुनते-मानते. उन्हें सन्तोष होता और जगदीश के भविष्य के प्रति आश्वस्ति भी. लेकिन पति की स्मृति से वे अपने को कभी काट न सकीं. दिनभर सामान्य दिखने वाली उनकी आंखें रात के अंधेरे में कितनी ही देर तक बरसती रहतीं.

कभी-कभी जगदीश जागकर पूछता, "अम्मा तुम लो लही हो?" वे तत्क्षण आंचल से आसूं पोंछ लेतीं और लोरियां सुनाकर उसे सुलाने में व्यस्त हो जातीं.

जिस जगदीश को पालने-पोसने में उन्हें कितने ही कष्टों का सामना करना पड़ा, आज वही उनके लिए पत्नी के सामने भीगी बिल्ली बन जाता है. उन्होंने एक दीर्घ निश्वास छोड़ी और पैर पर चढ़ रहे चीटें को हाथ से दूर झटक दिया .
*****
उस वर्ष ओलों से फसल नष्ट हुई तो कोठरियों-बखरियों में भरा पुराना अनाज काम आ गया. लेकिन उसके बाद एक के बाद एक तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई. अकाल पड़ गया. गांव के अनेकों घरों की भांति उनका घर भी दाने-दाने के लिए तरसने लगा. देवर एक-एक मुट्ठी चना अंगौछे में बांधकर सुबह काम करने जाते और दिन भर उसी के बल पर खटते रहते. वे दिनभर निराहार रहतीं, लेकिन जैसे-तैसे जगदीश का पेट भरतीं.
और एक दिन ऎसा भी आया जब घर में दाना नहीं बचा. कहीं से कुछ पाने की भी आशा न थी. जेवर और पुरानी पूंजी पहले ही बनिया के यहां जा चुकी थीं. तब भी वे हिम्मत नहीं हारीं और गांव छोड़कर शहर जाने को तत्पर देवरों को पुरखों की ड्योढ़ी खेत-खलिहान का वास्ता देकर रोकने में सफल रहीं थीं. उन दिनों महुआ उबालकर वे सबकी क्षुधा शांत करने का प्रयत्न करती रही थीं.

तभी एक घटना घटी थी. जमींदार का लगान वसूली अभियान जोरों पर था. सूखे का कुछ भी प्रभाव उन लोगों पर नहीं पड़ा था. जमींदार के नुमाइंदे निर्ममतापूर्वक लोगों को तबाह करने में व्यस्त थे. हर दिन जमींदार के सिपाहियों द्वारा किसी न किसी पर कोड़े बरसाये जाने, पेड़ों पर उल्टा लटकाये जाने और बैलों से घिसिटाये जाने के समाचार उन्हें मिलते. कितने ही किसानों को जमींदार ने खेतों से बेदखल कर दिया था. उस घर पर भी किसी न किसी दिन उसका कहर बरपा जरूर होगा, यह बात वे जानती थीं. उनके कहने पर देवर रात-दिन इधर-उधर रहने लगे थे, जिससे बेइज्जती से बच सकें. लेकिन वे ड्योढ़ी पर ही जमीं रही थीं जमींदार के सिपाहियों से मोर्चा लेने के लिए.

और एक दिन वह दिन भी आ गया. कारिंदा पंडित ब्रजभान चार सिपाहियों के साथ आ धमका. देवरों को अनुपस्थित पा सिपाहियों से बोला, "उखाड़ ले चलो ड्योढ़ी--- देखें कब तक तीनों मरदूद हाजिर नहीं होते."

सिपाही आगे बढ़े तो सिर पर घूंघट वह निकाल बोली थीं, "मैं खबरदार किए देती हूं---- ड्योढ़ी पर हाथ न लगाया जाय."

"अबे मुंह क्या देखने लगे--- उखाड़ते क्यों नहीं." कारिंदा चीखा था.
"पंडितजी यह ठाकुर जगमोहन सिंह के हाथों लगायी ड्योढ़ी है---- इस गौतम खनदान की इज्जत--- इतनी आसानी से न जाने दूंगी." आगे बढ़कर कुछ ऊंचे स्वर में वे बोलीं.

सिपाही ठिठक गए. पंडित ब्रजभान भी सकते में आ गया. कुछ संतुलित स्वर में बोला, "फिर अदा कर दो न लगान ठकुरानी. बेइज्जती से भी बचोगी और जमीन की बेदखली से भी."

वे मुड़कर घर के अन्दर गयीं और एक पोटली में बंधे चांदी के रुपये-सिक्के कारिन्दा के सामने उछालते हुए बोलीं , "गिनकर ले लो जितने लगान के लिए चाहिए."

पडित ब्रजभान और सिपाहियों की आंखें फटी की फटी रह गयी थीं.  हजार कष्ट सहकर भी घोर संकट के क्षणॊं के लिए धन बचाकर रखना वे गृहस्थी का भार संभालते ही सीख गयी थीं.उस दिन के बाद सारे गांव में चन्दन बहू के गुणगान गाये जाने लगे थे. लेकिन वे गांववालों के गुणगान से असंपृक्त ही रही थीं…. अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त.

आगे के वर्ष सामान्य होते गये थे. फसलें ठीक होने लगी थीं. अभाव कम होते गये थे.

जगदीश बड़ा हो गया तो उन्होंने उसे पढाना चाहा, लेकिन पांचवीं से आगे वह पढ़ न सका. चाचओं के साथ खेती सम्भालने लगा. चाचाओं का वह प्यारा भी बहुत था.

वर्ष गुजरते गये. दॊ छोटे देवर भी एक वर्ष के अन्दर ही काल के कराल गाल में विलीन हो गये. शेष बचे बड़े देवर कमल सिंह. कमल सिंह ने अपनी इच्छा से जगदीश की शादी की इस आशा से कि जीवन भर कष्टों से जूझने वाली उनकी भौजाई को अब इस उम्रमें कुछ सुख मिल सकेगा. पुत्रवधू के हाथों की सिकी उन्हें भी मिल सेकेगीं. भौजाई के हाथों की सिकी तो वे कब से खाते आ रहे थे. लेकिन कहां पूरी हो सकी उनकी इच्छा! वे भी एक दिन उन्हें छोड़कर चले गये.

अतीत के अंधेरे आकाश में जिन्दगी का इतिहास सदैव रोमांचक प्रतीत होता है. देवर की भांति पुत्रवधू से सुख की कामना उन्होंने भी की थी. लेकिन कामना करने से ही अभीप्सित नहीं मिल जाया करता. उन्होंने कभी जिस बात की कल्पना भी न की थी वह सब जगदीश के पचीस वर्षीय वैवाहिक जीवन में देखने-सुनने और सहने को मिला. वे किसे दोष दें--- प्रारब्ध को, स्वयं को या जगदीश को--- कभी समझ नहीं सकीं.
*****

बैठे-बैठे उनकी आंखें झपक गयीं कि पुत्रवधू की कर्कश आवाज ने उन्हें अचकचा दिया. झुर्रियों-भरे चेहरे पर टकी आंखें कसाई के सामने बंधी गाय की भांति पुत्रवधू के चेहरे पर टिक गयीं .

"यहां बैठे ऊंघ रही है----- वहां बर्तन पड़े गंधा रहे हैं---- घर की बिल्कुल चिन्ता ही नहीं रही----." पुत्रवधू ड्योढ़ी पर खड़ी चीख रही थी.

उनके मन में आया कि कह दें, 'वह किस घर की चिन्ता की बात कर रही है---- आज घर जिस स्थिति में है वह किसकी बदौलत---." लेकिन वह चुप  रहीं. जानती हैं एक वाक्य बोलने का अर्थ होगा सौ वाक्य सुनना. बहू बड़बड़ाकर उठ खड़ी हुईं.

"हे राम---- अभी और कितने दिन यह नर्क भोगना पड़ेगा." वह रसोई के बाहर नहा पर फैले बर्तनों के पास जमीन पर हाथ टिकाकर पीढ़े पर बैठ गयीं. बदन में असह्य पीड़ा हो रही थी. हाथ कांप रहे थे,  फिर भी उन्होंनें मंजना उठा लिया.

बारिस और तेज हो गयी थी. भूरा-मटमैला आकाश कुछ और नीचे झुक आया था. उन्होंने एक दृष्टि आकाश की ओर डाली, फिर कड़ाही पर मंजना घुमाने लगीं.
***
’अजगर तथा अन्य कहानियां’(१९८८)

कहानी-१४


हादसा
रूपसिंह चन्देल

गुजरते वक्त की प्रभाव से कोई नहीं बच पाता. वे भी न बच सकीं. सुदीर्घ, सुडौल और संगमरमरी शरीर अब ढीला पड़ने लगा है. गोल , सुगढ़ मुख पर टंकी आंखों के नीचे काली झायीं-सी उभर आयी है, जिसे उन्होनें चश्मे के नीचे चुपा रखा है. होठों का गुलाबी सौन्दर्य धूमिल पड़ चुका है. कितना परिवर्तन दिख रहा है उनमें ! हिरणी की तरह चंचल आंखें, जो सदैव अपने प्रति दूसरों के आकर्षण से चैतन्य रहा करती थीं, अब केवल सलाइयों से खेलते हाथों की गतिविधियों पर ही स्थिर हैं . एक समय यही आंखें लोगों की चर्चा का विषय हुआ करती थीं.

लेकिन यह एक अभीष्ट सत्य है कि एक सीमा तक ही कोई चर्चा में रहा करता है--- वैसा ही उनके साथ हुआ. वैसे उस छोटी-सी जगह, जहां मात्र एक फैक्ट्री के कर्मचारियों के परिवार ही रहते हैं, सदैव कोई-न कोई लड़की चर्चा के केन्द्र में रहती है, लेकिन जिस तेजी से किसी के बारे में चर्चा शुरू होती है, साल-दो साल में उसी तेजी से ठण्डी भी हो जाती है. लेकिन वे इस बात का अपवाद रहीं. लगातार चौदह-पन्द्रह वर्षों तक वे चर्चा के केन्द्र में रही हैं.

पहली बार फैक्ट्री क्वार्टर्स एक-दूसरे से उनके बारे में कानाफूसी करने लगे थे, जब वह बी०ए० अंतिम वर्ष में थीं. अविनाश फैक्ट्री में 'टूल-रूम' में सुपरवाइजर थे. कुछ दिन पहले ही चण्डीगढ़ से आए थे. चौबीस-पचीस के अविनाश फुटबाल के अच्छे किलाड़ी थे. उनका भाई भी फैक्ट्री में था और अविनाश के साथ खेलता था. दोनों में मित्रता हो गयी और अविनाश प्रायः उनके घर आने लगे. प्रारंभ में उन्होंने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. लेकिन एक दिन उन्हें लगा कि अविनाश उनमें रुचि लेने लगे हैं. उन्हें यह अच्छा लगा था.

वह उम्र कल्पनाओं में खो जाने वाली थी. वे भी अनेकानेक कल्पनाओं के किले बनाने लगीं. जिस अविनाश को शुरू में वे साधारण कर्मचारी और खिलाड़ी समझती थीं, अब उसमें ही उन्हें अनेकानेक गुण दिखाई देने लगे थे. प्रायः वे उसके साथ चर्चा करने लगतीं, पढ़ाई, खेल, संगीत और कला की. इन विषयों में उनकी जितनी जानकारी थी, अविनाश से बात करके उन्हें लगता कि वह कितनी कम थी. एक बार किसी विषय पर बहस करते हुए शाम को वह गंग नहर तक चले गये. लौटकर आए तो पिता ने मीठी झिड़की के साथ पूछा, "तुमी को थाम गिये छिले."

"नहर की ओर ----- बाबा."

पिता कुछ न बोले. अविनाश की ओर देखा और कमरे में चले गये.

"मिस चौधरी ---- आपके पिता---- बुरा तो न माने होगें----?" अविनाश ने पूछा तो वे उनकी आंखों में देखते हुए बोली थीं, "मेरे बाबा बहुत अच्छे हैं---- नाराज भी होते हैं तो ऎसा कि किसी को कुछ पता नहीं चल पाता---- "रियली हि इज़ अ नाइस फा़दर !"

"लेकिन तुम नहीं जानती--- वे मेरे फोरमैन हैं ---- मेरे अफसर."

"तो इसमें डरने की क्या बात है ?"

"बहुत सख्त हैं---- सभी उनसे डरते हैं वर्कशॉप में---- मैं भी----."

वह हंस पड़ी थीं---- उन्मुक्त हंसी. हंसी रुकती न अगर पीछे से सिर पर हल्की-सी चपत न पड़ी होती. उनका भाई था तुषार. फुटबाल खेलकर आया था.

"क्यॊं रे अविनाश ---- आजकल तू इस चुड़ैल कान्ता से गप लड़ाने के चक्कर में फुटबाल खेलने भी नहीं आता---."

अविनाश का मुख विवर्ण हो उठा था. कुछ बोल नहीं पाये थे. स्थिति संभालते हुए वही बोली थीं, "भइया----- मुझे इनसे अंग्रेजी का एक लेसन पढ़ना था---- मैंने ही बुलाया था."

"ओह---- सॉरी--- पढ़ाई के मामले में मैं दखल न दूंगा---- खुद तो इंटर से आगे पढ़ नहीं पया इसलिए----." दोनों कान पकड़ता तुषार भाग गया था.

दोनों हंस पड़े थे---- खिलखिलाकर.

उस दिन के बाद वे प्रायः नहर की ओर घूमने जाने लगे थे.

********

पिता, मां और भाई की उदासीनता से उन्हें उन्मुक्तता ही मिली थी. वह यह अनुभव करने लगी थीं कि शायद मां और बाबा को उन दोनों का मिलना अच्छा ही लगता है. इसके लिए वे मन ही मन तर्क दे लेती कि बंगाली परिवारों में व्याप्त दहेज-दानव के कारण शायद वे भी अविनाश को पसन्द करने लगे हैं.

धीरे-धीरे वह अविनाश के होस्टल तक जाने लगीं, और इतना ही पर्याप्त था फैक्ट्री वालों को चर्चा के लिए. शायद यह चर्चा भी दूसरों की तरह ही अल्पजीवी हुई होती, यदि वह हादसा उनके साथ न हुआ होता.

वह हादसा वर्षों-वर्षों तक उन्हे चर्चा के केन्द्र में बनाए रखने के लिए पर्याप्त था.

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उस दिन अविनाश ने प्रस्ताव रखा कि वे नहर की ओर न जाकर दक्षिण की ओर खेखड़ा गांव के किनारे के तालाब की ओर चलें. वे चल पड़ीं, कुर्ता-पायजामा में---- यही वे उन दिनों पहना करती थीं. लेकिन उस दिन अविनाश ने जिद की कि वे साड़ी पहनकर चलें. कभी पहनी न थी, इसलिए झिझकती रहीं. लेकिन जीत अविनाश की ही हुई. मां की साड़ी पहनकर जब वे निकलीं, अविनाश देखते रह गये थे उन्हें. वे स्वयं अपने को आदमकद शीशे में देखकर आय़ी थीं और मन-ही मन स्वयं पर मुग्ध हो उठी थीं. अविनाश का इस तरह देखना उन्हें अन्दर तक गुदगुदा गया था. वे चित्रलिखित-सी खड़ी रही थीं.

तालाब के किनारे एक झाड़ी के पास दोनों खोये रहे थे बातों में. दिसम्बर की शाम की ठण्डी हवा और बसेरे की ओर लौटते पक्षियों की चहचहाहट से सर्वथा अस्पर्शित वे भावी रेत-महल के निर्माण में निमग्न थे.

गर्मी की तलाश में सुर्य़ पश्चिमी क्षितिज में खो गया था. निकट गन्ने के खेत से काली चादर का फैलाव बढ़ता जा रहा था, वे स्थिर थे, ज्यों के त्यों.

अकस्मात अविनाश को पता नहीं क्या सूझा----- उन्हें अवसर दिए बिना ही उसके हाथ भी सक्रिय हो उठे थे---- अविनाश ने उन्हें आगोश में आबद्ध कर लिया था. उन्होंने कोई प्रतिरोध नहीं किया---- और दोनों एक-दूसरे की सांसें गिनने लगे थे---- तभी अंधेरे की चादर ने दोनों को पूरी तरह ढक लिया था.

पता नहीं कब तक दोनों यों ही खोये रहते---- यदि कुछ लोगों की खिलखिलाहट ने उन्हें अचकचा न दिया होता---- दोनों तुरन्त उठ खड़े हुए थे. लेकिन वे उनके बिलकुल निकट आ पहुंचे थे. वे तीन थे और उनके हाथों में हॉकियां थीं. दो ने अविनाश को पकड़ लिया था. उनके प्रतिरोध करने पर वे उन पर हॉकियों से प्रहार करने लगे थे. एक उन्हें पकड़कर गन्ने के खेत की ओर खींचने लगा था. वे चीखने लगीं तो चाकू उनके चेहरे के पास करके वह बोला, "आवाज निकाली तो एक मिनट में चेहरा छीलकर रख दूंगा."

अविनाश को वे बेरहमी से पीट रहे थे. उनके हांफने- कराहने की आवाज उनके कानॊं में टकरा रही थी. वह कसाई के हाथ पड़ी गाय की तरह छटपटा रही थीं और वह उन्हें घसीटता जा रहा था. अन्ततः वे फैल गयीं. वह उनका दाहिना हाथ पकड़कर घसीटने लगा. घास और कंकड़ॊं से कमर के पास का भाग छिलता जा रहा था. वह शक्ति भर उससे मुक्त हो जाने का प्रयत्न कर रही थीं, लेकिन लग रहा था कि शक्ति जवाब देने लगी है. शरीर शिथिल होता जा रहा था.

उन्होंने अंतिम कोशिश की---- हाथ झिटककर उठ बैठीं---- भागना चाहा अविनाश की ओर--- लेकिन तभी कमर के पास उसने पैर से चोट की और वे फिर ढेर हो गयीं---- उसके बाद उन्हें होश नहीं रहा---- और जब होश आया तब गन्ने के खेत में उन्होंने अपने को उन तीनों के बीच घिरी पाया. था.

गिद्धों की भांति वे एक के बाद एक उनके शरीर को नोंचते रहे थे. वे पुनः बेहोश हो गयी थीं. जब दोबारा होश आया था---- तब वे जा चुके थे. वे किसी प्रकार लड़खड़ाती अविनाश तक पहुंची थीं. वह तालाब के कीचड़ में पड़ा कराह रहा था. उन्होंने उन्हें कीचड़ से बाहर निकाला था किसी प्रकार, लेकिन उन्हें सहारा देकर घर ले जाने या स्वयं घर तक जाने की ताकत उनमें न बची थी. शायद दोनों ही रात भर वहीं पड़े रहते, यदि तुषार अपने मित्रों के साथ उन्हें खोजता न आ पहुंचता. उन्हें फैक्ट्री अस्पताल पहुंचाया गया था. दो दिन बाद वह वहां से डिस्चर्ज हो आयी थीं---- अविनाश को गहरी चोटें लगी थीं---- . अस्पताल से बाहर आते ही उन्होंने बाहर की हवा का रुख बदला हुआ पाया था---- एक -ब-एक फैक्ट्री के आवासीय क्षेत्र में चर्चाओं का बाजार गर्म हो उठा था.

*****

चर्चा ने तब और तूल पकड़ ली जब चौथे दिन अविनाश की मृत्यु का समाचार फैला . अविनाश चले गये---- उन्हें अपराधिनी-सा अभिशप्त जीवन जीने के लिए छोड़कर. समाचार पाकर चण्डीगढ़ से उनके पाता-पिता और कुछ रिश्तेदार आए थे. लोगों ने मां को नमक-मिर्च लगाकर बताया तो वे उसके सामने छाती पीटकर रोने लगी थीं उन्हें कोसते हुए. वह मुंह छुपाकर उनके सामने से हट गयी थीं.... बाद में पुलिस आयी ---- पूछताछ हुई---- और हाथ हिलाते पुलिस लौट गयी थी.

दिन, महीने और वर्ष बीतते गये, किन्तु वे आज भी अपराध-बोध से ग्रस्त हैं. उनके बाबा फैक्ट्री से फ़िरेटायर्ड हो चुके हैं. तुषार को दूसरा क्वार्टर मिल गया है.. सारा परिवार उसी नये क्वार्टर में शिफ्ट हो गया है.

तुषार की शादी हुई तो कुछ रिश्तेदारों ने उनके बारे में भी चर्चा चलाई ---- लेकिन बाबा और मां का साहस उनसे बात करने का नहीं हुआ---- उन्होंने स्वयं ही उस चर्चा को वहीं दबा दिया था---- अविनाश की यादों की अर्थी ढोना ही उन्होंने अपनी नियति मान ली थी----.

"आण्टी ये स्वेटर मेरे लिए बना रही हैं..?" तुतली आवाज में तुषार के ढाई साल के बेटे ने पूछा तो ऊन और सलाइयां एक ओर रखकर उन्होंने उसे गोद में उठा लिया और प्यार करने लगीं.

उस क्षण अविनाश उनकी पलकों में आ विराजमान हुए थे.


'अजगर तथा अन्य कहानियां' (१९८८)

कहानी-१३

निर्वासित
रूपसिंह चन्देल

अदृश्य लोक से उतरे मानव की तरह जब वे एक दिन आ उपस्थित हुए अपने श्वेत लम्बे बालों और दाढ़ी में अतीत का लम्बा इतिहास छुपाये तब गांव में तेज हलचल हुई थी. समाचार जंगल की आग की तरह गांव में एक छोर से दूसरे  छोर तक फैल गया था.

गांव वाले जिसे अब तक मृत स्वीकारते आ रहे थे----तकरीबन पैंतीस वर्षों बाद वही बटुकेश्वर उनके सामने थे.

"हाय हम यो का देखि रहे हन ?" हजार मुंह हजार बातें होने लगी थीं. सभी अपने-अपने ढंग से उनके अतीत को खुरचने लगे थे और वे अपनी पथराई आंखों से ध्वस्त पड़े पुश्तैनी मकान को देख रहे थे, जहां दफ्न थीं उनकी बचपन की यादें, किशोरावस्था की शरारतें और चढ़ती जवानी की अल्हड़ता.

उनकी यही अल्हड़ता---- अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने---- उठ खड़े होने की समझ ने जमींदार भूपति सिंह का दुश्मन बना दिया था उन्हें. बटुकेश्वर उसकी नजरों में कांटे की तरह चुभने लगे थे और भूपति उस कांटे को निकालने की कोशिश करने लगा था. उसने उनकी खड़ी फसल उजड़वा दी थी---- खलिहान में आग लगवा दी थी और ---- भैंसें-बैल चोरी करवा दिए थे, लेकिन वह उन्हें हिला न सका था. अंगद के पैर की तरह बटुकेश्वर जमे रहे थे उसकी आंखों की किरकिरी बनकर.

*******

वे मिट्टी में धंसी ड्योढ़ी पर बैठ गये थे. उनके पुराने साथियों में हरखू, धूमिल, किसना और मनहर आ गये थे---- कुछ और भी थे, लेकिन नयी पौध---- जवान बिरवों को वे पहचानते न थे और सर्वाधिक उत्सुक नजरों से वे ही उन्हें देख रहे थे.

"भइया इहां त हम सब आपका----." हरखू कुछ कहते-कहते रुक गया.

बटुकेश्वर मुस्कराये और पास पड़ी गिट्टी उठाकर दूर फेंक दी.

"इतने दिन कहां भटकते रहे---- पहले ही आ जाते गांव---- मां-बापू बेचारे तो तुम्हें मरा समझकर तुम्हारी याद में कुछ दिनों बाद ही चल बसे थे---- बिना देखभाल के ये घर ढह गया और वारिस के अभाव में खेत 'गांव पंचायत' ने हथिया लिए---." मनहर ने देखा उनकी आंखें गीली हो रही थीं.

"भइया मेरी बातों से ---- आपको----."

"नहीं मनहर---- सोच रहा था मैं कितना अभागा हूं---- कितना कर्तव्यच्युत, जो मां-बाप को सुख न दे सका."

"आपने गांव के लिए जो कुछ किया, गांव वाले उसे कभी भूल न सकेगें भइया --- यदि आप न आगे आए होते---- तो कितने ही परिवार बर्वाद हो चुके होते---- भूपति के अत्याचार कभी शान्त न होते---- लेकिन उस दिन के बाद उसे सांप सूंघ गया था---- क्षय रोग का शिकार हो गया था---- ."

वे चुप सुनते रहे.

"भइया राजरानी की कुछ खोज खबर---- हम सबको तो यही बताया गया था कि तुम्हारे साथ ही वह भी खता कर दी गयी थी----." धूमिल ने उन्हें कुरेदा.

"इसी झूठ को शायद भूपति पचा नहीं पाया था---- इसीलिए उसे क्षय हो गया था----धूमिल, यही तो उसकी सबसे बड़ी शिकस्त थी---." वे अतीत में खोते चले गये.

चारों साथी और निकट खिसक आए, बच्चे और युवक धीरे-धीरे खिसक गये थे. बटुकेश्वर के अन्दर अतीत अंगड़ाइयां लेने लगा था.

*******

जवान होते-होते बटुकेश्वर भूपति के बारे में बहुत कुछ समझ चुके थे. छोटे-बडे़ किसानों को उसके सताने की कितनी ही घटनाएं वे प्रत्यक्ष देख चुके थे. किसी भी किसान से उसकी नाराजगी किसान को उसकी जमीन से बेदखल करने के लिए पर्याप्त थी. साधारण-सी बात पर किसी के भी नंगे बदन पर कोड़े बरसवाने लगना उसका प्रिय खेल था. बटुकेश्वर देखते और दांत भींच लेते.

एक दिन उन्हे उसकी एक और कमजोरी ज्ञात हुई. गांव की किसी भी जवान बहू-बेटी को बलात अपनी हवश का शिकार बनाने की उसकी आदत ने बटुकेश्वर को क्रोधोन्मत्त कर दिया था. वे हम-उम्र युवकों को संगठित करने लगे. धूमिल, मनहर, हरखू, बिसना, जो आज उनके सामने हैं और जो अब नहीं हैं---- सभी ने मिलकर प्रतिज्ञा की थी कि वे भूपति का विरोध करेंगे----- कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े.

कीमत चुकानी भी पड़ी---- किसी को भूपति ने पिटवाया---- किसी की जमीन हड़पी और किसी की फसलें नष्ट करवा दीं. लेकिन वे नहीं झुके. तभी तीन घटनाएं हुईं. पहली यह कि सरकार ने जमींदारी समाप्त कर दी. इस घोषणा के कुछ दिन बाद ही दूसरी घटना घटी. एक दिन रात में बटुकेश्वर को सूचना मिली कि तीन लठैत जंगल से लौटती लकुवा चमार की बेटी को उठाकर हवेली की ओर ले गये हैं. बटुकेश्वर की आंखॊं में अंगारे दहक उठे थे. अपने साथियों को इकट्ठा कर वे जा पहुंचे थे हवेली . हल्ला सुन दूसरे गांव वाले भी, जो भूपति से डरते थे और प्रत्यक्ष कभी न आते थे, वहां पहुंच गये थे. सभी उत्तेजित.


हवेली घिर गयी थी. भूपति बन्दूक लेकर अटारी पर चढ़ गया था , "एक-एक को भून दूंगा---- स्सालों जमींदरी खत्म हुई ----- जमींदर नहीं---." हवाई फायर करते हुए वह चीखा था,

बटुकेश्वर अकेले ही घुस गये थे हवेली के अन्दर. तीनों लठैतों ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी, लेकिन उनसे निबटने के लिए बटुकेश्वर के दूसरे साथी पहुंच गये थे. वे सीधे धड़धड़ाते हुए जीना चढ़ने लगे थे---- भूपति बौखलाया-सा अटारी में घूम रहा था. बटुकेश्वर को सामने देख उसने बन्दूक संभाल ली थी, लेकिन गोली चलाने से पहले ही राजरानी ---- भूपति की छोटी बहन ने कहीं से आकर बाज की तरह भूपति से बन्दूक छीन ली थी. राजरानी से बटुकेश्वर ने ले ली थी बन्दूक और कारतूस निकालकर थमा दी थी भूपति के हाथ में. भूपति दांत पीसता रह गया था और बटुकेश्वर लकुवा की बेटी को लेकर हवेली से बाहर आ गये थे.

******

उस दिन बटुकेश्वर ने पहली बार राजरानी को भलीभांति देखा था. राजरानी बाल-विधवा थी---- उनसे तीन-चार वर्ष छोटी. उस दिन के बाद वे अनेक बार सोच चुके थे कि राजरानी ने क्यों भूपति से बन्दूक छीनकर उनके प्राण बचाये---- क्या वह भी भाई की गतिविधियों से त्रस्त है या उसका उनके प्रति----- वह जितना ही सोचते ---- उलझते जाते---- समझ में कुछ भी नहीं आता.

और तभी एक दिन भूपति के घर की पनिहारिन के हाथों उन्हें राजरानी का छोटा -सा पत्र मिला--- उस घटना के एक साल बाद.

"तुम एक हफ्ते के अन्दर गांव छोड़ दो ----- भइया तुम्हें जान से मरवाने की योजना बना रहे हैं.... बाहर से दो आदमी बुलाये गये हैं...."

पत्र में इसके अतिरिक्त कुछ भी न था. बटुकेश्वर मुस्कराये थे. पन्द्रह दिनों के लिए भूमिगत हो गये थे. लौटे थे तब नयी ताजगी का भाव मन में लिए हुए. इसके बाद ही शुरू हो गया था पनिहारिन के माध्यम से उनका और राजरानी का पत्राचार जो धीरे-धीरे मुलाकातों में बदल गया था और एक दिन दोनों ने गांव से दूर चले जाने का निर्णय कर लिया था. निश्चित हुआ था कि राजरानी रात का अंधेरा गहराते ही बड़े पुल के पास बरगद के पेड़ के नीचे मिलेगी. बटुकेश्वर पेड़ के पास की किसी झाड़ी में पहले ही जा बैठेंगे. तीसरी घटना उस दिन घटी थी.

अकेले न जा पायी थी राजरानी वहां तक. पनिहारिन साथ थी. दोनों बरगद के पेड़ से कुछ ही दूर पर थीं, कि उन्हें भूपति की आवाज सुनाई पड़ी थी और साथ ही लाठियों के टकराने की आवाज . अंधेरे में कुछ भी समझ न आया था, लेकिन वह अनुमान कर सकी थी कि बटुकेश्वर को घेरकर मारा जा रहा है. पनिहारिन घबड़ाकर भाग गई थी, लेकिन वह एक झाड़ी में छुपकर बैठ गयी थी---- एक निर्णायक स्थिति में.

बटुकेश्वर अपनी लाठी से बेहोश होने तक चारों लठैतों का प्रतिरोध करते रहे थे. बेहोश होकर गिरने से पहले वे चारों को भी भलीभांति घायल कर चुके थे. शायद वे सब शिथिल हो चुके थे, इसीलिए 'जिन्दा न छोड़ने' के भूपति के निर्देश को अनसुना कर वे बोले थे, " लगभग मर चुका है ठाकुर साहब---- अगर कुछ कसर रह गयी होगी तो रात में जंगली जानवर पूरी कर देंगे----."

टॉर्च की रोशनी में कुछ क्षण तक निस्पन्द पड़े बटुकेश्वर के शरीर को देखते रहे थे भूपति---- फिर सड़क की ओर बढ़ गये थे. उनके जाते ही राजरानी बटुकेश्वर के पास पहुंची थी---- और कितनी ही देर तक कभी उनके सिर से बहते खून को साड़ी से पोंछती और कभी उनकी ह्रदय गति देखती रही थी. वह निर्णय नहीं कर पा रही थी----- क्या करे. तभी एक उपाय सूझा था उसे---- वह स्टेशन की ओर दौड़ गयी थी झाड़ियों से उलझती-टकराती. झूठी कहानी गढ़कर सुना दी थी उसने स्टेशन मास्टर को.बताया था, "वे पति-पत्नी रात दस बजे की 'जनता-एक्स्प्रेस ' पकड़ने आ रहे थे कि डकैतों ने उन्हें लूटकर पति को इतना मारा कि वह परणासन्न पड़े हैं."

सुनकर स्टेशन मास्टर द्रवित हो उठा था. उसने दो खलासी भेज दिए थे उसके साथ.  दोनों  खलासियों की मदद से वह बटुकेश्वर को स्टेशन ले आयी थी और 'जनता-एक्स्प्रेस' से शहर आ गयी थी. उस समय साथ लायी निजी जेवर उसके काम आयी थी. स्टेशन से सीधे अस्पताल गयी थी वह, जहां लगभग एक महीने तक बटुकेश्वर पड़े रहे थे. उसके बाद वे सीधे अहमदाबाद चले गये थे.

अहदाबाद में कुछ दिनों तक भटकने के बाद बटुकेश्वर को एक फैक्ट्री में काम मिल गया था और वे वहां व्यवस्थित हो गये थे.

******

"भइया ---- जननी जन्मभूमि---- याद तो आती ही रही होगी ." मनहर ने मौन तोड़ा.

"बहुत कुछ याद आता रहा मनहर..... मैं आया भी इसीलिए था---- लेकिन----."

"लेकिन क्या बटुकेश्वर.....?" धूमिल ने पूछा.

"मैं सोचता हूं अब लौटना इतना आसान नहीं है धूमिल ---- चाहकर भी नहीं---- गांव वालों ने मुझे मृत मान लिया----- उन्हें यह तो सोचना ही चाहिए था कि मुझ जैसा व्यक्ति क्या मर सकता है---- वह भी एक आततायी के हाथों ---- कुछ तो प्रतीक्षा करते---- पैंतीस वर्ष भी न रुक सके---- खेत ग्राम पंचायत ने ले लिए ---- घर --- पता नहीं अब तक क्यों नही----."

सभी चुप रहे.

बटुकेश्वर ही बोले, "अब यहां आने का मतलब है वहां की---- अहमदाबाद के ठिकाने को उजाड़कर यहां फिर से ---- नये सिरे से स्थापित होने का प्रयत्न करूं.... आज के समय में---- क्या यह संभव है....?" वे सभी की ओर देखने लगे. सभी फिर भी चुप रहे.

"मैं आज ही ग्राम प्रधान से मिलकर घर भी ग्राम पंचायत को दे दूंगा और कुछ रुपये भी---- जिससे यहां 'ग्राम सभा भवन' बन सके....."

"बटुकेश्वर अब----." मनहर ने कुछ कहना चाहा. लेकिन उन्होंने बात बीच में ही काट दी, "नहीं मनहर ---- अब यहां आना ---- रहना कठिन है.... मुझे निर्वासित ही रहने दो."

सभी ने देखा उनकी आंखें फिर गीली थीं.

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'अजगर तथा अन्य कहानियां' (१९८८)

कहानी-१२


अजगर

रूपसिंह चन्देल


सांय-सांय करती हवा रातभर दरवाजे से टकराती रही. दरवाजे के छेदों में उसने कपड़े ठूंस रखे थे, लेकिन कपड़े बौखलाये भेड़िये के सामने निहत्थे बच्चे की तरह कमजोर साबित हुए थे. हवा उन्हें भेदकर कोठरी में चारों ओर दौड़ती रही थी.

पुआल पर लेटा मन्ना ठण्ड से जूझता रातभर सोने की असफल कोशिश करता रहा . आधी रात के बाद कुछ देर के लिए झपकी लगी भी, लेकिन तभी पसली के दर्द ने उसे दोहरा कर दिया. उसके बाद वह सो नहीं सका. रह-रहकर दर्द उठता रहा और वह करवटें बदलता रहा.

मुर्गे ने बांग दी तो उसने कथरी से सिर बाहर निकाला. अंधेरे में आंखें गड़ाकर इधर-उधर देखा. कुछ नहीं सूझा. वह उठ बैठा. जेब में पड़ी एक मात्र बीड़ी सुलगाई और तीली की रोशनी में देखा, पत्नी और बेटी सावित्तरी एक-दूसरे से गुड़ीमुड़ी हुई लेटी हैं. तीली के बुझने तक वह उन्हें देखता रहा.

इन दिनों उसकी सबसे अधिक चिन्ता का विषय सावित्तरी है.एक साल से वह उसकी शादी के लिए परेशान है. कई गांव भटकने के बाद सरपतखेड़ा के बिपता पासी का लड़का वह ठीक कर पाया है . लड़का उतना पसन्द नहीं उसे, जितनी पसन्द आयी थी बिपता की दहेज की मांग. बिपता ने केवल एक हजार नकद तिलक मांगा था, जबकि दूसरे चार-पांच हजार से नीचे बात भी नहीं करते थे. वह अमिताभ सिंह से एक हजार लेकर तिलक कर आया था---- छः महीने से ऊपर हो चुके तिलक किए---- वह शादी को आगे बढ़ाता जा रहा है---- क्योंकि कुछ तो देना ही पड़ेगा शादी में---- बिरादरी इकट्ठी होगी---- उसका खाना-पीना---- कहां से लाए वह इतनी रकम---- एक हजार के ब्याज के बदले में वह छः महीने से अमिताभ सिंह का गोबर ढो रहा है---- और अधिक कर्ज लेने का मतलब जिन्दगी भर के लिए----.

बीड़ी खत्म हो गयी तो जमीन पर रगड़कर उसे फेंक दिया और सोचने लगा, 'समय की अंधी दौड़ ने उसकी बिरादरी को भी गुमराह कर दिया है. आज भी जिस बिरादरी के ज्यादातर लोग मजूरी करके मुश्किल से अपना गुजारा कर रहे हैं---- अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने की बजाय मजूर बनाना बेहतर समझते हैं, वही अपने मजूर बेटों के लिए मोटा दहेज मांगते हैं---- यह जानकर भी कि लड़कीवाला उन्हीं की तरह एक मजूर है----- दूसरों के यहां काम करके अपना घर चलाने वाला---- मुश्किल से दो जून की रोटी का जुगाड़ कर पाने वाला.'

वह जब भी इस विषय में सोचने लगता है, पसली का दर्द और तेज हो जाता है. छः महीनों में कम से कम छः सन्देश उसे मिल चुके हैं बिपता के----- शादी करो या जवाब दो....' जवाब देने का अर्थ वह समझता है. शादी के लिए इंकार करवाकर बिपता अब एक हजार की रकम डकार जाना चाहता है.

मुर्गे ने फिर बांग दी. उसने कथरी अपने चारों ओर लपेट ली. तीन साल से वह इसी कथरी से जाड़ा काटता आ रहा है. पुराने कुर्ते और फटी जर्सी को भेदकर हड्डियों में नश्तर चुभाने से ठण्ड को रोकने में कथरी उसकी काफी मदद करती है. दिन में वह उसे लपेटे रहता है और रात में उसी को ओढ़ता भी है.

पैसों की किल्लत के कारण वह दूसरी रजाई नहीं बनवा पा रहा. एक---- तकरीबन दस साल पुरानी रजाई है, जिसे सावित्तरी और उसकी मां ओढ़ती हैं. उसकी रजाई दो साल पहले जार-जार हो चुकी थी. उसके पाल्हे के कुछ अच्छे टुकड़ों को पुराने चादर और धोती के बीच दबवाकर उसने अपने लिए यह कथरी सिलवा ली थी.

"सावित्तरी की अम्मा----." उसने पत्नी को आवाज दी.

"सो जाव----अबै बहुत राति है." पत्नी रजाई के अंदर से ही बोली.

"अरे बावली---- दरवाजा खोल---- भिनसार होइगा---- अल्लारखा चाचा का मुर्गा दुई बार बोलि चुका है...."

"उंs ---- हूं--- तुमहूं ---कौउनौ दिन देर ते----."

"उठ---उठ ----तू भी कुछ देख---- आज तोहका लैन पार वाले खेतन मा निराई करैं जायं का है न---- कल अमिताभ सिंह कहे रहैं---- उठ." उसने दरवाजे की कुंडी खोल दी. दरवाजा खुलते ही हवा ने उस पर तेज आक्रमण किया. सारा शरीर हिल उठा. मन हुआ वह न जाये. उसने फिर दरवाजा भेड़ दिया और पैर की ओट लगाकर खड़ा हो गया.

"नहीं जांयका ?" पत्नी दरवाजा बन्द करने के लिए खड़ी थी.

पसली का दर्द और तेज हो गया था. पत्नी को कोई उत्तर न देकर वह पसली को सहलाता रहा.

"दर्द होई रहा है---- त न जाव."

वह कुछ नहीं बोला. थोड़ी देर तक पसली पर हाथ फेरता रहा, फिर दरवाजा खोलकर बाहर निक्ल गया.

******

अमितभ सिंह के घेर में पहुंचने पर उसने देखा कि रघुआ कोरी और भजना लोध पहले से ही आये हुए हैं और कर्बी(ज्वार) के बोझ संभाल रहे हैं. दोनों मिलकर सुबह होने तक छः बोझ कर्बी मशीन से भुथर डालते हैं . दोनों जाड़े भर अमिताभ सिंह के जानवरों के लिए कुट्टी काटते हैं, जिससे दोनों के कर्ज की रकम का ब्याज ही चुकता होता है. मूलधन ज्यों का त्यों बना रहता है.

रघुआ का लड़का दुधाई करता था---- गांव का दूध शहर ले जाकर बेचता था. अमिताभ सिंह की भैंसों का दूध भी वही लेता था. एक दिन उन्हीं के घेर में जुआ हो रहा था. अमिताभ सिंह ने उसे भी खेलने के लिए उकसाया. लड़का जुआ में दूध के बेच की सारी रकम हार गया. दूसरे दिन अमिताभ सिंह उससे अपने दूध के पैसे मांगने लगे---- पांच सौ रुपये. रघुआ के लड़के ने जब असमर्थता जाहिर की---- उन्होंने लात-घूंसों से उसे पीटा---- दूध भरे डिब्बे फेंक दिए---- मग तोड़ दिया. लड़का उसी दिन से कहीं भाग गया. दो साल हो गये---- गांव नहीं आया---- और रघुआ न पांच सौ रुपये चुकता कर पा रहा है और न कुट्टी काटने से उसे मुक्ति मिल पा रही है. भजना लोध ने भी दो साल पहले उनसे कुछ रुपये उधार लिए थे और अब वह भी रघुआ के साथ मशीन खींचता है.

"राम--राम--मन्ना." उसे देख दोनों एक साथ बोले.

"राम--राम भइया --- तनिक एक बीड़ी त देव---- यो दरद लागत है जान लैकेई छोड़ी." मन्ना ने कांखते हुए कहा.

"बीड़ी----." रघुआ और भजना ने टिमटिमाती ढिबरी की रोशनी में एक दूसरे की ओर देखा और बोले, "बीड़ी त न है."

"ओह---." मन्ना बैठ गया पसली दबाकर.

"दरद ज्यादा है ?" रघुआ ने पूछा.

मन्ना कुछ नहीं बोला. पसली दबाता रहा. दोनों उसके पास आए. भजना ने कहा, "पैरा(पुआल) जलाकर कुछ देर सेक लो ."

"न, ओहते कुछ फाइदा न होई----बीड़ी मिल जाति त---- कउनौ बात नहीं----." मन्ना पसली दबाए बोला, "जाव तुम दोनों मशीन चलाव ---- नहीं त सुबो ठकुर की आंखें लाल-पीली मिलिहैं."

रघुआ और भजना अपने काम में लग गए. वह भी उठा और झौआ (बड़ा टोकरा) लेकर गोबर समेटने लगा.

पन्द्रह जानवरों का गोबर समेटते-समेटते वह हांफ उठा. थोड़ी देर बैठकर उसने हफन दूर की, फिर झौआ में गोबर भरने लगा. भर चुकने के बाद उसने रघुआ को आवाज दी कि वह झौआ सिर पर रखवा दे. अंगौछे को सिर पर लपेटकर उसने रघुआ की मदद से झौआ सिर पर रख लिया और फटे जूतों को सटकारता घूरे की ओर चल पड़ा. घूर गांव से बाहर था---- घेर से लगभग एक फर्लांग दूर. घूरे तक पहुंचना उसके लिए कठिन हो गया. दर्द चलने नहीं दे रहा था. किसी प्रकार गोबर फेंककर वह लौटकर घेर तक आ पाया. दूसरा जौआ भरने का सहस उसमें न था. वह बैठकर पसली दबाने लगा.

रघुआ और भजना मशीन से जूझ रहे थे. दोनों में से एक बारी-बारी से कर्बी मशीन में ठूंस देता, फिर आकर मशीन चलाने लगता.

थोड़ी देर बाद वह उठा. उसने फिर झौआ भरा और रघुआ को आवाज देकर उसे सिर पर रखवा लिया. इस प्रकार कुछ देर आराम कर-करके वह तीन झौवे गोबर फेंक आया. अभी कम-से कम चार-पांच झौआ गोबर शेष था. चौथा झौआ भरते-भरते उसका साहस जवाब दे गया. दर्द के कारण वह दोहरा हो गया. दोनों हाथ से पसली दबाकर वह वहीं बैठ गया. बैठा रहा बहुत देर तक. लेकिन 'कब तक इस तरह बैठा रहेगा' सोच वह उठा और रघुआ की मदद से झौआ सिर पर रख लिया. वह दो कदम ही आगे बढ़ा था कि लड़खड़ा कर गिर गया. गोबर छितरा गया. उसने उठने की कोशिश की, लेकिन उठ न सका.

रघुआ और भजना ने सहारा देकर उसे बैठाया.

"मन्ना तुम घर जाव---- तबीयत ठीक न है तुम्हार--- ठाकुर साब पुछिहैं त हम बता देब." भजना ने सलाह दी.

वह उनकी ओर देखता रहा क्षण-भर तक, फिर अटक-अटक कर बोला, "ई गोबर--- ."

"ई का हम दोनों मिलिकै फेंक देब ---- जब तबीयत ठीक न है---- त तू कैसे फेंकबे."

मन्ना उनकी ओर देखता रहा और दाहिने हाथ से पसली सहलाता रहा.

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तीन दिन तक वह अमिताभ सिंह के यहां नहीं गया. चौथे दिन तबीयत कुछ ठीक हुई. वह घर के बाहर बैठा धूप सेक रहा था. तभी उसकी नजर बिपता पर पड़ी. उसके मस्तिष्क में आशंकाओं का सांप लहराने लगा. और आशंका निर्मूल न थी. आते ही बिपता ने शादी की बात छेड़ दी. मन्ना घुमा-फिराकर टालने की कोशिश करता रहा. लेकिन जब उसने देखा बिपता एक महीने के अन्दर शादी कर लेने की जिद कर रहा है तब हाथ जोड़कर बोला, "भइया एक महीना का टैम त बहुत कम है---- जुगत बन न पा रही ---- छः महीना की मोहलत दै देते तो---."

बिपता भड़क उठा, "टालते-टालते छः महीना गुजरि गए मन्ना----- अब एक महीना से अधिक टैम न देब---- करौ---- वर्ना जवाब देव---- तुम्हारी बेटेवा खातिर अपुन लरिका कुंवारा न बैठारि राखब."

सुनकर मन्ना भौंचक उसे ताकता रहा, उसे लगा वह एक ऎसी जगह पहुंच गया है, जहां अंधेरा ही अंधेरा है---- घुप अंधेरा. वह उस अंधेरे से निकलना चाह रहा है, लेकिन अंधेरे का अन्त नहीं है. अंधेरे में वह अजगरों के बीच फंसा पाता है अपने को. वह कांपकर आंखें बन्द कर लेता है. थोड़ी देर बाद खोलता है तो पाता है कि वे अजगर उसे निगलने के लिए आगे बढ़ रहे हैं. वह फिर आंखें भींच लेता है. लेकिन जल्दी ही उसे घुटन-सी महसूस होने लगती है. वह आंखें खोल देता है. देखता है अजगर गायब है---- उनके स्थान पर उसे अमिताभ सिंह और बिपता दिखाई देते हैं---- दोनों ही अट्टहास करते हुए--.

"तुमने कुछ जवाब नहीं दिया मन्ना."

वह बिपता की आवाज से चौंक उठा. बिपता लाठी टेक उठ खड़ा हुआ.

"तनिक बैइठो भइया----." दीर्घ निश्वास ले उसने बेटी को आवाज दी, "सावित्तरी ---- ओ---- सावित्तरी ---मेहमान आए हैं बेटा---- कुछ पानी -वानी----."

"न मन्ना अब न रुकब---- कुछ जरूरी चीजैं खरीदैं का है बाजार से----."

"तनिक तौ रुकौ---."

"रुकन का---- तुम कुछ जवाब तौ दीन्ह्यों नहीं---- का हम समझी तुम शादी न करिहौ."

"न भइया---- न --- ऎसा न कहौ---- कुछ मोहलत चाहत हौं---- पन आप तौ जिद करि रहे हौ---- फिर देखब ----जैसे-तैसे ---करज लेई लिवाई कै----."

"तौ ठीक है---- राम-राम."

वह बिपता को जाता देखता रहा. सड़क के मोड़ पर उसके ओझल होते ही मन्ना उठा और डंडा टेकता धीरे-धीरे लड़खड़ाता चल पड़ा अमिताभ सिंह के घर की ओर. अमिताभ सिंह घर के बाहर बने पक्के चबूतरे पर पड़े पलंग पर लेटे थे---- धूप में. मन्ना को देखते ही तकिया पर दोनों कुहनी टेककर उठंग हो गये और बोले, "इधर कैसे भटक गए----सरकार ?"

मन्ना उनके व्यंग्य को समझ गया. क्षण भर तक कहने के लिए शब्द तलाशता रहा, फिर हाथ जोड़कर बोला, "पसली के दरद ने ट्यूनभर करि दिया ठाकुर साब----- मेरे कारन आपको जो तकलीफ हुई रही है ओहके खातिर----."

"तू बोल--- इस समय किसलिए आया है---- ज्यादा वक्त नहीं है तेरी बकवास सुनने के लिए."

मन्ना हत्प्रभ, कुछ समझ नहीं पा रहा था क्या कहे! वह तो सोचकर आया था कि डेढ़ हजार रुपये और मांगेगा करज उनसे, जिससे बेटी की नैया पार लगा सके, लेकिन अब कुछ कहने का साहस नही जुटा पा रहा था वह.

"रुपये लाया है....?"

"रुपिया----ठाकुर साब----मैं----."

"मैं कुछ नहीं जानता---- काम पर नहीं आना तो रुपये तो देने ही होंगे---- और दो सौ रुपये ब्याज भी---- पूरे बारह सौ----."

"ठाकुर साब ---मैं----मैं तो----." उसे लगा जैसे गले में कुछ फंस गया है.

"स्साले साफ-साफ क्यों नही बोलता---जुबान कट गई है?"

मन्ना ने उनके पैर पकड़ लिये.

पैर सिकोड़ते हुए कुछ नर्म आवाज में अमिताभ सिंह बोले, "बोल क्या बात है?"

शुरू से अन्त तक बताकर मन्ना बोला, 'डेढ़ हजार का और खरच है---- आप मेहरबानी करि देव तौ हम जिनगानी भरि गुलामी करब आपकी ठाकुर साब."

"पैसा डालों में नही फलता मन्ना---- जब देखो मुंह उठाये चले आते हो---- कल एक हजार---- आज डेढ़ हजार----."

"ठाकुर साब आपै का....." हाथ जोड़कर वह फिर गिड़गिड़ा उठा.

अमिताभ सिंह उसे देखते रहे एकटक, बोले कुछ नहीं. मन्ना उसी तरह खड़ा रहा उनके पलंग के पास नजरें नीचे झुकाए.

"तू एक काम करेगा....?" अमिताभ सिंह ने उसके चेहरे पर आंखें गड़ाकर पूछा.

"हुकुम करैं ठाकुर साब."

"रुपये दूंगा पूरे---- लेकिन अभी नहीं हैं---- शाम तक इंतजाम हो सकेगा."

"आप जब कहैं---- आ जाई----." उसके चेहरे पर खुशी की झलक थी.

"तू बीमार है---- तू क्या करेगा आकर."

"आप काहे का तकलीफ करिहौ मेरे घर तलक आवैं का मालिक....."

"मैं क्यों आने लगा....!"

"फिर....?"
"तेरी बेटी सावित्तरी है न---- उसको कहना रात में आ जाये----सुबह--- उसी को दे दूंगा ---- रुपये ---पूरे---- बल्कि ----दस-बीस----."
शरीर कांपने लगा  मन्ना का और डंडे पर हाथों की पकड़ मजबूत हो गयी-----. वह चीक उठा, “ठाकुर सा..S..S.. ह… ब.. .S..S..”
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'अजगर तथा अन्य कहानियां' (१९८८)