Thursday, 20 October 2011

कहानी - ११


सजा 

रूपसिंह चन्देल

यह बात नहीं कि ऐसा पहली बार हुआ था। गांव में  जब तब किसी-न किसी बारे में गुप-चुप बातें चलती ही रहती थीं । आखिर गांव वालों को भी चभुलियाने के लिए कुछ तो चाहिए। दिन भर खेती के कामों में व्यस्त रहने वालों को रात में मिल-बैठने पर चर्चा के लिए कुछ ऐसे विषयों की जरूरत होती है, जिन्हें रस ले-लेकर वे जुगाली कर सकें, जिससे रात का भोजन हजम हो सके। और ऐसा विषय उनके हाथ सदैव लग ही जाता है, जिसे वे लंबे समय तक खींच ले जाते हैं और जब वह पुराना पड़ने लगता है, किसी पुराने कपड़े की भांति उसे कभी कभार के लिए छोड़कर नये विषय को पकड़ने में जुट जाते हैं।

भीखमपुर के चरित्र की यह एक  विशेषता है। शहर से कुछ दूरी पर बसा यह गांव किसी उपेक्षित विधवा की भांति अपनी परम्पराओं से लिपटा हुआ खुश है। सभी सुबह से शाम तक अथक श्रम करते हैं और रात में चौपालों या चबूतरों पर बैठकर घण्टे-दो घण्टे चर्चाओं का रस लेकर अपने को हल्का कर लेते हैं। किसी तालाब के पानी की भांति इस गांव का जीवन सदैव स्थिर और शान्त रहा है।

लेकिन आज उसकी स्थिरता में उबाल आ गया है और शान्ति भाप बनकर उड़ गई है। सारा गांव किसी खौलते कड़ाहे की भांति हो रहा है। सभी के मुंह में उसमान मियां और फूलना कोरिन की ही चर्चा है।

"कलजुग और किसे कहते हैं--- इस उमर में ई करम---- अब गांव का सत्यानाश निकट है।" लल्लन पंडित ने एक दृष्टि चौपाल में उपस्थित लोगों पर डाली और बोले, "अब यह गांव भी गंधाने लगा है--- भगवान ही रक्षा कर सकते हैं----इसकी।"

"सच कहत हौ भैया---- आज तलक तौ ई तरह नहीं हुआ---- अगर कुछ भया तौ छुप-छुपकर ---- पर ई दोनों ने तो गजब करि दिया।" भोला सिंह ने हां में हां मिलाया।

शेष लोग किसी विचार में लीन चुप ही रहे। कुछ देर यों ही बीत गया। लल्लन पंडित की बेचैनी बढ़ रही थी। वह तुरन्त निर्णय पर पहुंचने के लिए विकल हो रहे थे और उन्हें विश्वास था कि लोग उनके निर्णय का स्वागत करेंगे। क्योंकि वह उस गांव के पहले व्यक्ति थे, जो शहर में दस साल गुजारकर गांव लौटे थे। इसलिए गांव में उनका सम्मान था। प्रायः लोग उनसे सलाह लेते और उनके सुझावों पर अमल करते। गांव वालों पर लल्लन पंडित का प्रभाव इतना अधिक हो गया कि जब कुछ दिन पहले गांव पंचायत के चुनाव हुए, निर्विरोध वह ग्राम प्रधान चुन लिए गए। और ग्राम प्रधान बनने के बाद यह पहला अवसर था जब उनकी चौपाल में किसी विषय पर विचार किया जा रहा था।

"गाव के पंच यहां मौजूद हैं---- वे ही इस विषय पर हमें कुछ बतायें---- क्या करना चाहिए?" लल्लन पंडित ने पंचों को सम्बोधित कर कहा।

पंच सकपका गये। आज तक ऐसी कोई समस्या उनके सामने आयी न थी। वे क्या जवाब दें ! सभी एक-दूसरे की ओर देखने लगे।

"जरा सोचो तो भला--- इस तरह क्या गांव की बदनामी नहीं होती---- आज तक हम दूसरे गांवों के लोगों पर कीच।ड़ उछालते थे--- और आज जब हमारे ही गांव में--- तब दूसरे गांव वालों को भी मौका नहीं मिलेगा?" लल्लन पंडित बोले.

"मिलेगा भैया---- जरूर मिलेगा-- पर जब तक ई साबित न हो जाय कि दोनों क्या कर रहे थे---- तब तक---"। प्रितपाल बोले।

"इसका मतलब यह  कि तुम्हें मेरी बात में यकीन नहीं है---- अरे मैंने स्वयं देखा था दोनों को--- अपनी आंखों से--- खलिहान में गेहूं की लांक की आड़ में----।" लल्लन पंडित का स्वर कुछ उग्र था।

"भइया, मेरा  विचार है कि दोनों को डां-डपटकर-समझाकर छोड़ दिया जाय-- आखिर गांव का मामला है---- जितना ही उछाला जायेगा---गांव की ही बेइज्जती होगी।"

"प्रितपाल भाई---- यह क्यों नहीं सोचते कि इसका बुरा असर हमारे नौजवानों पर पड़ेगा-- जब ये बूढ़े होकर इस तरह की हरकत----।"

लल्लन पंडित की बात बीच में ही काटकर भोला सिंह बोले, "भैया आप हम सबसे ज्यादा समझदार हो, आप ही कुछ सुझाव दो---- हम सब मानब ---पंच भी मनिहैं।"

"आप लोग एक बार फिर सोच लें--- और अगर कोई सुझाव हो किसी का तो वह बताए।" लल्लन पंडित की बात पर सभी चुप रहे।

"पंचो आपको मेरा सुझाव स्वीकार होगा?"

"आप कहें ।" प्रतिपाल को छोड़कर शेष  एक स्वर में बोले.

"--- सुनिये---“ सभी पर उचटती नजर डालकर लल्लन पंडित बोले, ‌ “मेरा सुझाव है कि शाम को हम फिर यहां इकट्ठा हों--- उसमान और फुलना को बुलाया जाय--- फुलना को गांव छोड़ देने और उसमान को पांच सौ रुपये और नहर किनारे वाला आमों का बाग गांव पंचायत को देने की सजा दी जाय । यदि उसमान को यह सजा मंजूर न हो तो उसे भी गांव छोड़ने की सजा दी जाय।"

"लेकिन यह तो बड़ी कठोर सजा है---।"

प्रितपाल की बात बीच में ही काटकर लल्लन पंडित बोले, "अगर आप ढिलाई बरतोगे तो गांव में ऐसे अनाचारों की भरमार हो जायेगी।" कुछ उग्र स्वर में लल्लन ने कहा," बाकी लोगों का क्या विचार है?"

सभी चुप रहे।

खबर मियां मोहल्ले तक पहुंची । यह मोहल्ला गांव के हरिजन मोहल्ले से सटा हुआ है और ठकुर-ब्राम्हणों के मोहल्ले से थोड़ा दूर भी है--- गांव के उत्तरी छोर में। मोहल्ले में बारह घर हैं मुसलमानों के। सभी छोटे काश्तकार और अपने काम और अपने में ही व्यस्त रहने वाले। प्रायः गांव की चर्चा-कुचर्चा से दूर रहने वाले लोग । लेकिन आज सभी हत्प्रभ उसमान की चौपाल में सिमट आये थे। उसमान मियां एक झिंगला खटोली में पड़े कराह रहे थे। शरीर सूखकर कांटा हो चुका था। आवाज में कंपन था उनके। लेकिन तब भी उत्तेजित स्वर में उन्होंने मोहल्ला वालों को सम्बोधित करते हुए कहा, "देखा तुम सबने लल्लन को---- मैं दस दिन से बुखार में पड़ा तड़प रहा हूं… खलिहान तो दूर---- दरवाजे के बाहर तक नहीं गया----- और इल्जाम ---- या खुदा----।" आंखें बन्द कर उन्होंने शिथिल हाथों को  खटौली की पाटी पर छोड़ दिया। रमजानी से चुप न रहा गया। बोले, "मियां परेशान क्यों होते हो---- हम सब साथ हैं---- हकीम साहब की बात उन्हें माननी ही पड़ेगी कि वे कब से आपका इलाज कर रहे हैं----।"

"आप बेफिक्र रहो मियां---- देखें लल्लन पंडित यहां कैसे शहरी राजनीति चला पाते हैं।"

"पुरानी दुश्मनी निकाल रहे हैं आज लल्लन ---- याद होगा आप लोगों को---- नहर के पानी वाला झगड़ा---- मेरे खेत की बारी थी--- उनकी बारी खत्म हो चुकी थी, लेकिन उनका खेत पूरी तरह सिंच न पाया था। वह चाहते थे मैं अपनी बारी का अधा समय का पानी उनके खेतों में जाने दूं---- मैंने मना कर दिया था---- इस पर उन्होंने धमकी दी थी-- देख लेने की---- और आज---।"

सभी सोचने लगे वर्षों पुरानी उस बात को।

"चलना पड़ेगा पंचायत में?" उसमान से पूछा।

"आप  कहीं  नहीं जायेंगे  मियां---- मियादी बुखार है--- बिगड़ गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे।" हकीम रहमतुल्ला खां अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले।

उसमान के चेहरे पर परेशानी के चिन्ह उभर आये।

"आप चिन्ता न करे भाई जान---- हम सभी वहां जायेंगे---- हकीम जी भी---- लल्लन पंडित ग्रामप्रधान हैं तो क्या, पंच भी तो होंगे वहां---- वे आकर देख सकते हैं आपकी हालत----।"

उसमान चुप रहे। छत पर बिछी धन्नियां और कड़ियां गिनते रहे।

लेकिन फुलना चुप न थी। जब से उसने सुना था कि उस पर ऐसा इल्जाम लगाया है लल्लन पंडित ने और शाम को उसे और उसमान मियां को पंचायत में हाजिर होने और सजा सुनाने के लिए बुलाया गया है तब से वह अपनी झोपड़ी के दरवाजे के पास बैठी लल्लन पंडित के पारिवारिक इतिहास को उद्घाटित करने में व्यस्त थी। उनके परिवार की प्रत्येक महिला की चारित्रिक व्याख्या प्रस्तुत कर चुकने के बाद वह सोचने लगी , 'हरामजादा---- आज मुझ बूढ़ी पर इल्जाम लगाने चला है---- लेकिन मैंने भी गांव सभा के सामने उसकी इज्जत न धो दी तो अपने बाप की औलाद नहीं--- याद दिलाऊंगी पापी को उस दिन की जब घास छीलने वाले हाथ का भरपूर तमाचा मारा था उसके गाल पर--- भूल गया होगा बदमाश---- भूला नहीं---- यह उसीका बदला ले रहा है।’


’समझता होगा आज मैं अकेली हूं---- न आदमी, न बेटा-बेटी--- मुझे कमजोर जान दबा लेगा--- गांव से निकालकर मेरा दस बिसवे का खेत हथिया लेगा--- मैं खूब समझती हूं उसकी चाल---- पुरानी पापी ठहरा--- सभी तो जानते हैं उसको---फिर पता नहीं क्यों गांववाले उसे देवता समझने लगे---- ’

"कौन किसे मूरख बनाये रहता है चाची?" पुसुआ ने पूछा तो फुलना अचकचा गयी।

"सुना  तुमने भी होगा  बबुआ---- आज गांव सभा के सामने लल्लन पंडित मुझे बेइज्जत कर गांव से निकल जाने की सजा देंगे।"

"सुना है---लेकिन ऐसा हम सब न होने देंगे--- चाहे जो कुछ हो जाये----। आज आपके खिलाफ --- तो कल एक-एक कर हम सभी के खिलाफ वह इसी तरह की बातें करेंगे…।"

"लेकिन गरीबन की कोई आवाज नहीं होती बबुआ।"

"चाची---- गरीब जब उठ खड़े होत हैं--- तब सब कुछ बदल भी देत हैं…। आज आप देख्यो---।"

"पूसू--- तुम सब ---मेरे खातिर---।" भावातिरेकवश फुलना आगे न बोल पायी।

"हां चाची---- हम सबने पता लगा लिया है---- उसमान चाचा दस दिन से बुखार में पड़े तड़प रहे हैं ---सचाई का है---- हम सब जानत हैं---- तुम चिन्ता न करौ---- सारा मोहल्ला तुम्हरे साथ चलिहै--।"

धुशी से फुलना की आंखों से आंसू छलक आये।

शाम को लल्लन मंडित के घर के बाहर खुले मैदान में सारा गांव इकट्ठा था। ठाकुर- ब्रम्हणों का समूह एक स्थान पर, शेष प्रत्येक जाति के लोग अपने मोहल्ला वालों के साथ  बैठे थे। एक ओर दो तख्तों पर दरियां बिछाकर लल्लन पंडित और गांव के पंच विराजमान थे। कुछ छतों से स्त्रियां और बच्चे उचक-उचककर कार्रवाई देखने-सुनने की कोशिश कर रहे थे।


लोग आपस में खुसुर-फुसुर कर रहे थे। लल्लन पंडित गंभीर मुद्रा में विचार मग्न थे। तभी एक पंच ने उन्हें बोलने के लिए कहा।

चारों ओर  दृष्टि डालने के बाद लल्लन पंडित ने उसमान और फुलना के विरुद्ध आरोप सुनाया और प्रत्यक्षदर्शी के रूप में अपने को बताया। कुछ देर वह लोगों की प्रतिक्रिया देखते रहे, लेकिन लोग चुप एक-दूसरे की ओर देख रहे थे।

कुछ देर बाद लल्लन पंडित फिर बोले, "ऐसे अनाचारियों को क्या सजा दी जाय, इसी के लिए हम सब यहां एकत्र हुए हैं?"

"पंडित जी आपके अलावा वहां कोई और भी था जिसने उन दोनों को देखा हो?" रमजानी ने पूछा।

"क्या आपको मेरी बात में यकीन नहीं?"

"यकीन कैसे हो---- जब उसमान मियां दस दिन से बुखार में तड़प रहे हैं तब वह कल खलिहान में कैसे पहुंच गये---- सुबह?" हकीम रहमतुल्ला खां का स्वर कुछ तेज था।

"यह सब बेकार की बातें मत करो--- कहां हैं उसमान --- पेश करो उन्हें।" लल्लन पंडित के साथ भोला सिंह बोले।

"वह घर में चरपाई पर---- बीमार---।"

"हां बीमार हैं…।" उसमान मियां के मोहल्ले वालों का समवेत स्वर गूंजा।

पंच एक-दूसरे की ओर देखने लगे। भीड़ में फुसफुसाहट के स्वर तेज हो उठे थे। तभी फुलना चीखती भीड़ को चीरती आगे बढ़ी और तख्त के सामने आ खड़ी हुई। लल्लन पंडित उसे देखते रह गहे। उनके चेहरे पर जनरें गड़ाकर फुलना बोली, "पंडित , कितने बरस पुराना बदला ले रहे हो मुझसे ?"

"क्या बक रही है--- जुबान संभालकर बोल।"

"याद नहीं --- शहर जाने से दो साल पहले तूने मुझे पतिपाल भैया के खेत में घास छीलते समय आ घेरा था---- बुरी नीयत से -- तब मैं बई हट्टी-कट्टी थी--- एक जोरदार तमाचे में ही तुम्हारा गाल सूज गया था---- और जब मैंने शोर मचाकर लोगों को इकट्ठा करना चाहा तब तुमने हाथ जोड़कर माफी मांगी थी--- पैर पकड़ने चाहे थे---- और यह बात किसी से न कहने की कसम दिलाई थी---- आज उसी का बदला ले रहे हो---- लेकिन मत भूलना-- फुलना आज हट्टी-कट्टी न सही---- पर कमजोर भी नहीं है।"

लल्लन पंडित के पसीना छूट आया। इधर-उधर देखने के बाद वह चीखने का नाटक करते हुए बोले, "बकवास बन्द कर तू---- और आज ही गांव छोड़कर कहीं और मुंह काला कर।"

"फुलना चाची कहीं नहीं जायेंगी पंडित---- और न ही उसमान चाचा जायेंगे कहीं---- भलाई इसी में है कि आप ही अपना मुंह काला करें जाकर कहीं।" पुसुआ चीखा।

रमजानी और रहमतुल्ला खां भी एक स्वर में बोले, "पुसुआ ठीक कह रहा है…।"

लल्लन पंडित कुछ बोल नहीं सके। हकबकाए-से लोगों को देख रहे थे. उनके कानों में कितनी ही आवाजें गूंज रही थीं – “पुसुआ ठीक कह रहा है----पुसु---आ”


'अजगर तथा अन्य कहानियां' (1988 )

कहानी - १०


मरीचिका

रूपसिंह चन्देल
कार के उधर मुड़ते ही उनकी आंखें उस पर टिक गयीं। छड़ी पर दाहिने हाथ की पकड़ मजबूत कर वे कुर्सी पर तनकर बैठ गये और कार का रंग पहचानने की कोशिश करने लगे। सुबह की गुनगुनी धूप में भी उन्हें उसका रंग स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। वह उन्हें सफेद, पीली, आसमानी और किसी क्षण मिले-जुले कई रंगों की दिखायी दे रही थी। उन्हें झुंझलाहट हुई सूरज पर जो ठीक उनके सामने रोशनी उगल रहा था। एकटक कार को देखने से उनकी आंखें चौंधिया गयीं। क्षण-भर के लिए उन्होंने आंखें बन्द कर लीं। लेकिन अधिक क्षण तक वे अपने को रोक नहीं सके। इस बार आंखों के ऊपर बायां हाथ तानकर वे देखने लगे।

कार सरकती हुई आश्रम के गेट पर आकर रुकी तो उनकी आंखों में उसका रंग स्पष्ट हो उठा। 'क्रीम कलर' की एम्बेसडर थी। उनके दिल की धड़कन कुछ तेज हो गयी। महिन्दर के दोस्त की ही होनी चाहिए ये कार---- दोस्त की कार में ही तो वह आता रहा है अब तक। वे सोचने लगे, "मैं उठकर गेट तक नहीं जाऊंगा--- अपने आप वह ढूंढ़ता हुआ आयेगा यहां---- डेढ़ साल बाद आया है---- देखें पहचान पाता है या नहीं----।"

उन्होंने एक दृष्टि फिर कार पर डाली और किसीको उससे उतरते देखा। धुंधलाई आंखों से उसके सफेद चमकदार सूट और आकृति का लेखा-जोखा कर उनका अनुमान अब विश्वास में बदलने  लगा कि वह उनका बेटा महिन्दर ही है। खुशी से उनका दिल फिर तेजी से धड़कने लगा। क्षण-भर तक उधर देखने के बाद वे उठ खड़े हुए और कुर्सी का रुख गेट की ओर से दूसरी ओर करके  बैठ गये और सोचने लगे, ’देखना है महिन्दर मुझे खोजता हुआ कितनी देर में यहां आ पाता है।’ यह सोच उन्हें उतना ही आनन्द आया जितना किसी बच्चे को आंख -मिचौली खेलने में आता है।

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छः महीने से महिन्दर की प्रतीक्षा करती उनकी आंखें थक गयीं हैं। जैसे-जैसे समय बीतता गया---- उनकी विकलता बढ़ती गयी---- प्रारम्भ में वह छः महीने में एक बार अवश्य आ जाता था--- कुछ वर्षों बाद यह अवधि बढ़कर वर्ष में एक बार हो गयी---- क्योंकि उसकी व्यस्तता बढ़ गयी थी---- उसकी पत्नी बीना ने भी कहीं नौकरी कर ली थी---- बच्चे स्कूल जाने लगे थे--- आदि-आदि समस्याएं वह उन्हें बता देता और वे वर्ष में एक बार उसके आने की प्रतीक्षा में अपना समय काटते रहते ---- लेकिन इस बार डेढ़ वर्ष से ऊपर हो गया है---- उन्हें उसे देखे।

उसके समाचार जानने के लिए उन्होंने चार पत्र भी उसे लिखे। लेकिन आज तक वे अनुत्तरित हैं। महिन्दर के न आने और न ही पत्रों के उत्तर देने से उनके अन्दर आशंकाएं मक्खियों की तरह मंडराने लगी हैं। बार-बार एक प्रश्न कचोटने लगा है उन्हें, 'कहीं वह उनसे पूर्णतया मुक्ति तो नहीं चाहता---- जान-बूझकर तो यह उदासीनता नहीं ओढ़ रहा वह---- या कोई विवशता----।' वे जितना ही सोचते हैं, उलझते जाते हैं और एक निष्कर्ष निकाल लेते हैं, 'उसका यह व्यवहार अकारण नहीं है---- वह भी पश्चिमी सभ्यता का अंग जो बन चुका है।'

और यह विचार आते ही उनका ह्रदय दरक-दरक जाता है---- हजारों तीव्र ज्योतिस्फुलिंग बुझते दिखायी देते हैं उन्हें।


’तो क्या इसीलिए उन्होंने उसे इस योग्य बनाया था---- यही सुख पाने के लिए---- जीवन के अन्तिम दिन सरकारी कृपा पर आश्रित रहकर 'वृद्धाश्रम' में बिताने के लिए----।’ उनका मन अतीत की कन्दराओं मे भटकने लगता है।

फौज की अफसरी---- प्रतिक्षण अनुशासन की संगीनों पर लटकते फौजी आदेश---- एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकती जिन्दगी और पत्नी की असामयिक मृत्यु से घबड़ाकर उन्होंने महिन्दर को 'बोर्डिंग' में डाल दिया था--- बचपन से ही उसे अपने से अलग करना पड़ा था उन्हें---- न चाहकर भी। लेकिन वे इस बात से सदैव सन्तुष्ट रहे थे कि वे जैसी अपेक्षा उससे करते थे, महिन्दर पढ़ने में उससे भी दो हाथ आगे था।

उसके एम.एस.सी करने तक वे लेफ्टीनेण्ट कर्नल के पद पर पहुंचकर अवकाश प्राप्त कर चुके थे। एम. एस.सी. के बाद महिन्दर को आई आई टी दिल्ली में एम टेक में प्रवेश मिल गया तो वह वहीं होस्टल में रहने लगा। वे साउथ एक्स्टेंशन में किराये के मकान में रहने लगे।

एम टेक करने के तुरन्त बाद उसे यू एस ए जाने का अवसर मिला। वे अपनी कमाई का अधिकांश भाग उसकी पढ़ाई पर खर्च कर चुके थे। अध्ययन समाप्त होते ही महिन्दर को वहीं पर जॉब मिल गया। वे प्रसन्न थे।

वे साउथ एक्सटेंशन का मंहगा मकान छोड़कर सफदरजंग एन्क्लेव के दो कमरों के छोटे से फ्लैट में आ गये थे और पेंशन से अपना गुजारा करने लगे थे। वे यह सोचकर प्रसन्न थे कि जल्दी ही महिन्दर आयेगा और वे उसके साथ यू एस ए चले जायेगे और एक दिन महिन्दर आया भी---- अकेले नहीं था वह----उसके साथ में भारतीय मूल की एक लड़की भी थी ---- जिसके साथ वह वहीं शादी कर चुका था--- उस दिन उन्हें पहली बार यह अनुभव हुआ कि कहीं कुछ ऐसा अवश्य है, जहां वे चूक गये हैं। उन्हें इस बात का दुख न था कि उसने विवाह कर लिया था--- दुख इस बात का था कि उनको बताने तक की आवश्यकता अनुभव न की थी महिन्दर ने।

वर्ष दर वर्ष गुजरते रहे और उनकी शारीरिक क्षमता घटती गयी। महिन्दर प्रतिवर्ष आता रहा उनसे मिलने--- कभी अकेले--- कभी बीवी-बच्चों सहित---- उनसे आग्रह भी करता साथ चलने के लिए---- लेकिन वे टाल जाते।

उन्होंने अपने आराम के लिए एक नेपाली लड़का रख लिया था। तीन वर्षों तक वह उनकी सेवा करता रहा। उस नौकर पर अपनी सारी जिम्मेदारी छोड़कर वे निश्चिन्त थे। लेकिन तभी एक दिन रात में वह लड़का उनके कुछ रुपये, रेडियो, घड़ी आदि सामान लेकर भाग गया। इस घटना के दूसरे दिन अखबार में उन्होंने एक अन्य चोरी और हत्या की घटना पढ़ी---- भयानक और वीभत्स समाचार था वह। वृद्ध दम्पति के एक बेटी थी शादी-शुदा---- अपने घर में। उन्होंने भी अपनी सुविधा के लिए एक नौकर रखा हुआ था--- उस नौकर ने अपने दो साथियों के साथ मिलकर उन दोनों की हत्या की थी---- और नकदी और कीमती सामान उठा ले गया था।

इस समाचार ने उनके मन से यह धारणा समाप्त कर दी कि वे भी नौकरों के बल पर अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं। लेकिन सब कुछ स्वयं कर सकना भी संभव नहीं रहा था--- सफाई-खाना--- आदि। कई दिनों तक वे होटलों से काम चलाते रहे--- लेकिन वहां का भोजन उन्हें पसन्द नहीं आया।

वे विकल्प की तलाश में थे---- और तभी एक दिन उनकी मुलाकात एक वृद्ध इंजीनियर वेणुगोपाल से हो गयी। वह कभी सी पी डब्लू डी में सुपरिंटेडिंग इंजीनियर रहे थे और अब उन्हीं की भांति उपेक्षित अवकाश प्राप्त जिन्दगी जी रहे थे। वेणुगोपाल के बेटे - बेटियां भी विदेशों में बस गए थे---- उन्हें यहां अकेला छोड़कर। महिन्दर तो उन्हें अपने साथ ले भी जाना चाहता था, वे ही नहीं गए थे---- लेकिन वेणुगोपाल के बेटे-बेटियों ने उन्हें साथ ले जाने से स्पष्ट मना कर दिया था।

वेणुगोपाल से उनकी मुलाकात होटल में ही हुई थी और दो मुलाकातों में ही वेणुगोपाल उनके अच्छे मित्र बन गए थे। शायद एक जैसा जीवन जीने वाले---- एक ही जैसे दुख से दुखी लोग जल्दी ही एक दूसरे के निकट आ जाते हैं। ऐसा ही उनके साथ भी हुआ।

वेणु ने ही उनके सामने प्रस्ताव रखा कि क्यों न वे लोग शहर के बाहर नये बने 'वृद्धाश्रम' में चलकर रहें। नया खुलने के कारण वहां प्रवेश मिलने की संभावना थी और एक दिन दोनों जा पहुंचे थे वहां--- देखकर उन्हें लगा था कि वहां रहा जा सकता है---- कम से कम एक जैसे लोग तो हैं वहां---- । और उन दोनों ने वहां प्रवेश ले लिया था।

आश्रम में एक सौ तीस लोग---- सभी उन जैसे ही वृद्ध ---- उनमें से अधिकांश ऐसे ही थे जिनके बेटे-बेटियां पश्चिमी देशों में जा बसे थे---- जहां की संस्कृति में अक्षम और असमर्थ वृद्धों के लिए परिवार के दरवाजे प्रायः बन्द हो जाया करते हैं---- वैसी ही पीड़ा से ग्रस्त उन सबको उस आश्रम में शरण लेनी पड़ी थी---- कुछ ऐसे थे जिनका अब दुनिया में कोई न था---- कुछ के घर-परिवार के लोग यहीं थे---- लेकिन उनकी वृद्ध काया की देख-संभाल के लिए उनके पास वक्त न था। आश्रम उन सबके लिए वरदान था---- जहां सभी अपने अतीत के सुख-दुख बांटते और वर्तमान की उदासियों को भूल जाते।

कभी किसी का बेटा-बेटी या रिश्तेदार उससे मिलने आ जाते हैं--- वर्ष में एकाध बार। वह क्षण उसके लिए रोमांचक होता है---- अतीत की गुंजलक में खोये किसी सुखद क्षण की भांति ही।

वे भी ऐसे क्षण में----- जब महिन्दर उनसे मिलने आता है---- सारे दुख भूल जाते हैं----वे उस क्षण को मुट्ठी में बन्द कर लेना चाहते हैं---- चाहते हैं कि महिन्दर उनके पास ही बैठा रहे---- उनसे बतियाता रहे---- लेकिन उसे भागने की चिन्ता रहती है----- कभी किसी दफ्तर के काम से तो कभी एम्बेसी के चक्कर में----- वे मन मसोसकर रह जाते हैं।

आश्रम में आते समय उन्होंने सोचा था कि महिन्दर को यह अन्यथा अवश्य लगेगा---- लेकिन जब उनकी इस सूचना पर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की तब वे अन्दर से और अधिक टूट गये थे और सोचते रहे थे कि गलती उन्हीं की है---- सही संस्कार नहीं दे सके वे उसे---- और इसे ही नियति मानकर वे आश्रमवासियों के साथ सब कुछ भूलने का प्रयत्न करन लगे थे। सब कुछ भूल भी गये थे---- लेकिन उसके बाद भी अपने रक्त को देखने की लालसा उनके अन्दर से कभी न मिट सकी। महिन्दर के आने का समाचार उन्हें उसी प्रकार पुलकित कर देता , जिस प्रकार किसी बच्चे को लाली-पॉप मिलने की आशा।

लेकिन इतने दिनों से उसका कोई समाचार---- सूचना न पाकर वे परेशान रहने लगे हैं। उनकी परेशानी-वेकली वेणुगोपाल समझते हैं और जब-तब उन्हें समझाने लगते हैं---- ''कर्नल वख्तावर सिंह---- इस मोह को त्याग दो---- जब यह आश्रम ही अपना घर और यहां के लोग पारिवारिक सदस्य हैं तब उस झूठे मोह से अपने को बांधे रहना मरीचिका ही है---- आकाश कुसुम की आशा में आंखें फोड़ते रहने की दारुण प्रक्रिया से मुक्ति पाओ कर्नल---- देखो मैं कितना खुश रहता हूं---- क्योंकि मैं उस मोह से---- बेटे-बेटी, जिनके पास हमारे लिए समय नहीं है---- मुप्त हो चुका हूं---- तुम भी----।"


"काश! मैं भी ऐसा कर पाता वेणु!" वे दीर्घ निश्वास ले वेणुगोपाल को चुप करा देते हैं हर बार।

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सफेद शूट में वह युवक अपनी पत्नी सहित उनके बिल्कुल पास से गुजर गया। उन्हें आश्चर्य हुआ, उसने उनकी ओर मुड़कर भी नहीं देखा। उनकी नजरें उसी पर टिकी थीं--- एक बार वह उनकी ओर देखे तो पता चले कि वह महिन्दर है या कोई अन्य---- वे उस युवती का चेहरा नहीं देख पाये थे। वे सोचने लगे, ’अगर महिन्दर है तो बच्चे कहां हैं --- हो सकता है पढ़ाई की वजह से न लाया हो…’ आगे वे कुछ सोच पाते इससे पहले ही किसी ने पीछे से उनके कंधे पर हाथ रखा---- उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, वेणुगोपाल थे--- मुस्कराते हुए।

"कहो कर्नल क्या सोच रहे हो?"

"कुछ नहीं वेणु----।" वे अचकचा गए।

"आज बलविन्दर कौर के बेटा-बहू आए हैं मिलने ---यू के से--- पूरे दो साल बाद----।"

"अच्छा ---- वो सफेद शूट में----।" वे उठ खड़े हुए, लेकिन उन्हें लगा कि वे चक्कर खाकर गिर जायेंगे। वेणु ने उन्हें संभाल लिया। क्षणभर तक वे खड़े रहे, फिर एक दीर्घ निश्वास ले बोले, "चलो कहीं घूम आते हैं वेणु।"

और वे शिथिल कदमों से चल पड़े।

(यह कहानी 1986 में कभी लिखी गयी थी)

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'अजगर तथा अन्य कहानियां' (1988 )
 जनप्रिय प्रकाशन, विश्वासनगर, दिल्ली