सजा
रूपसिंह चन्देल
यह बात नहीं कि ऐसा पहली बार हुआ था। गांव में जब तब किसी-न किसी बारे में गुप-चुप बातें चलती ही रहती थीं । आखिर गांव वालों को भी चभुलियाने के लिए कुछ तो चाहिए। दिन भर खेती के कामों में व्यस्त रहने वालों को रात में मिल-बैठने पर चर्चा के लिए कुछ ऐसे विषयों की जरूरत होती है, जिन्हें रस ले-लेकर वे जुगाली कर सकें, जिससे रात का भोजन हजम हो सके। और ऐसा विषय उनके हाथ सदैव लग ही जाता है, जिसे वे लंबे समय तक खींच ले जाते हैं और जब वह पुराना पड़ने लगता है, किसी पुराने कपड़े की भांति उसे कभी कभार के लिए छोड़कर नये विषय को पकड़ने में जुट जाते हैं।
भीखमपुर के चरित्र की यह एक विशेषता है। शहर से कुछ दूरी पर बसा यह गांव किसी उपेक्षित विधवा की भांति अपनी परम्पराओं से लिपटा हुआ खुश है। सभी सुबह से शाम तक अथक श्रम करते हैं और रात में चौपालों या चबूतरों पर बैठकर घण्टे-दो घण्टे चर्चाओं का रस लेकर अपने को हल्का कर लेते हैं। किसी तालाब के पानी की भांति इस गांव का जीवन सदैव स्थिर और शान्त रहा है।
लेकिन आज उसकी स्थिरता में उबाल आ गया है और शान्ति भाप बनकर उड़ गई है। सारा गांव किसी खौलते कड़ाहे की भांति हो रहा है। सभी के मुंह में उसमान मियां और फूलना कोरिन की ही चर्चा है।
"कलजुग और किसे कहते हैं--- इस उमर में ई करम---- अब गांव का सत्यानाश निकट है।" लल्लन पंडित ने एक दृष्टि चौपाल में उपस्थित लोगों पर डाली और बोले, "अब यह गांव भी गंधाने लगा है--- भगवान ही रक्षा कर सकते हैं----इसकी।"
"सच कहत हौ भैया---- आज तलक तौ ई तरह नहीं हुआ---- अगर कुछ भया तौ छुप-छुपकर ---- पर ई दोनों ने तो गजब करि दिया।" भोला सिंह ने हां में हां मिलाया।
शेष लोग किसी विचार में लीन चुप ही रहे। कुछ देर यों ही बीत गया। लल्लन पंडित की बेचैनी बढ़ रही थी। वह तुरन्त निर्णय पर पहुंचने के लिए विकल हो रहे थे और उन्हें विश्वास था कि लोग उनके निर्णय का स्वागत करेंगे। क्योंकि वह उस गांव के पहले व्यक्ति थे, जो शहर में दस साल गुजारकर गांव लौटे थे। इसलिए गांव में उनका सम्मान था। प्रायः लोग उनसे सलाह लेते और उनके सुझावों पर अमल करते। गांव वालों पर लल्लन पंडित का प्रभाव इतना अधिक हो गया कि जब कुछ दिन पहले गांव पंचायत के चुनाव हुए, निर्विरोध वह ग्राम प्रधान चुन लिए गए। और ग्राम प्रधान बनने के बाद यह पहला अवसर था जब उनकी चौपाल में किसी विषय पर विचार किया जा रहा था।
"गाव के पंच यहां मौजूद हैं---- वे ही इस विषय पर हमें कुछ बतायें---- क्या करना चाहिए?" लल्लन पंडित ने पंचों को सम्बोधित कर कहा।
पंच सकपका गये। आज तक ऐसी कोई समस्या उनके सामने आयी न थी। वे क्या जवाब दें ! सभी एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
"जरा सोचो तो भला--- इस तरह क्या गांव की बदनामी नहीं होती---- आज तक हम दूसरे गांवों के लोगों पर कीच।ड़ उछालते थे--- और आज जब हमारे ही गांव में--- तब दूसरे गांव वालों को भी मौका नहीं मिलेगा?" लल्लन पंडित बोले.
"मिलेगा भैया---- जरूर मिलेगा-- पर जब तक ई साबित न हो जाय कि दोनों क्या कर रहे थे---- तब तक---"। प्रितपाल बोले।
"इसका मतलब यह कि तुम्हें मेरी बात में यकीन नहीं है---- अरे मैंने स्वयं देखा था दोनों को--- अपनी आंखों से--- खलिहान में गेहूं की लांक की आड़ में----।" लल्लन पंडित का स्वर कुछ उग्र था।
"भइया, मेरा विचार है कि दोनों को डां-डपटकर-समझाकर छोड़ दिया जाय-- आखिर गांव का मामला है---- जितना ही उछाला जायेगा---गांव की ही बेइज्जती होगी।"
"प्रितपाल भाई---- यह क्यों नहीं सोचते कि इसका बुरा असर हमारे नौजवानों पर पड़ेगा-- जब ये बूढ़े होकर इस तरह की हरकत----।"
लल्लन पंडित की बात बीच में ही काटकर भोला सिंह बोले, "भैया आप हम सबसे ज्यादा समझदार हो, आप ही कुछ सुझाव दो---- हम सब मानब ---पंच भी मनिहैं।"
"आप लोग एक बार फिर सोच लें--- और अगर कोई सुझाव हो किसी का तो वह बताए।" लल्लन पंडित की बात पर सभी चुप रहे।
"पंचो आपको मेरा सुझाव स्वीकार होगा?"
"आप कहें ।" प्रतिपाल को छोड़कर शेष एक स्वर में बोले.
"--- सुनिये---“ सभी पर उचटती नजर डालकर लल्लन पंडित बोले, “मेरा सुझाव है कि शाम को हम फिर यहां इकट्ठा हों--- उसमान और फुलना को बुलाया जाय--- फुलना को गांव छोड़ देने और उसमान को पांच सौ रुपये और नहर किनारे वाला आमों का बाग गांव पंचायत को देने की सजा दी जाय । यदि उसमान को यह सजा मंजूर न हो तो उसे भी गांव छोड़ने की सजा दी जाय।"
"लेकिन यह तो बड़ी कठोर सजा है---।"
प्रितपाल की बात बीच में ही काटकर लल्लन पंडित बोले, "अगर आप ढिलाई बरतोगे तो गांव में ऐसे अनाचारों की भरमार हो जायेगी।" कुछ उग्र स्वर में लल्लन ने कहा," बाकी लोगों का क्या विचार है?"
सभी चुप रहे।
खबर मियां मोहल्ले तक पहुंची । यह मोहल्ला गांव के हरिजन मोहल्ले से सटा हुआ है और ठकुर-ब्राम्हणों के मोहल्ले से थोड़ा दूर भी है--- गांव के उत्तरी छोर में। मोहल्ले में बारह घर हैं मुसलमानों के। सभी छोटे काश्तकार और अपने काम और अपने में ही व्यस्त रहने वाले। प्रायः गांव की चर्चा-कुचर्चा से दूर रहने वाले लोग । लेकिन आज सभी हत्प्रभ उसमान की चौपाल में सिमट आये थे। उसमान मियां एक झिंगला खटोली में पड़े कराह रहे थे। शरीर सूखकर कांटा हो चुका था। आवाज में कंपन था उनके। लेकिन तब भी उत्तेजित स्वर में उन्होंने मोहल्ला वालों को सम्बोधित करते हुए कहा, "देखा तुम सबने लल्लन को---- मैं दस दिन से बुखार में पड़ा तड़प रहा हूं… खलिहान तो दूर---- दरवाजे के बाहर तक नहीं गया----- और इल्जाम ---- या खुदा----।" आंखें बन्द कर उन्होंने शिथिल हाथों को खटौली की पाटी पर छोड़ दिया। रमजानी से चुप न रहा गया। बोले, "मियां परेशान क्यों होते हो---- हम सब साथ हैं---- हकीम साहब की बात उन्हें माननी ही पड़ेगी कि वे कब से आपका इलाज कर रहे हैं----।"
"आप बेफिक्र रहो मियां---- देखें लल्लन पंडित यहां कैसे शहरी राजनीति चला पाते हैं।"
"पुरानी दुश्मनी निकाल रहे हैं आज लल्लन ---- याद होगा आप लोगों को---- नहर के पानी वाला झगड़ा---- मेरे खेत की बारी थी--- उनकी बारी खत्म हो चुकी थी, लेकिन उनका खेत पूरी तरह सिंच न पाया था। वह चाहते थे मैं अपनी बारी का अधा समय का पानी उनके खेतों में जाने दूं---- मैंने मना कर दिया था---- इस पर उन्होंने धमकी दी थी-- देख लेने की---- और आज---।"
सभी सोचने लगे वर्षों पुरानी उस बात को।
"चलना पड़ेगा पंचायत में?" उसमान से पूछा।
"आप कहीं नहीं जायेंगे मियां---- मियादी बुखार है--- बिगड़ गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे।" हकीम रहमतुल्ला खां अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले।
उसमान के चेहरे पर परेशानी के चिन्ह उभर आये।
"आप चिन्ता न करे भाई जान---- हम सभी वहां जायेंगे---- हकीम जी भी---- लल्लन पंडित ग्रामप्रधान हैं तो क्या, पंच भी तो होंगे वहां---- वे आकर देख सकते हैं आपकी हालत----।"
उसमान चुप रहे। छत पर बिछी धन्नियां और कड़ियां गिनते रहे।
लेकिन फुलना चुप न थी। जब से उसने सुना था कि उस पर ऐसा इल्जाम लगाया है लल्लन पंडित ने और शाम को उसे और उसमान मियां को पंचायत में हाजिर होने और सजा सुनाने के लिए बुलाया गया है तब से वह अपनी झोपड़ी के दरवाजे के पास बैठी लल्लन पंडित के पारिवारिक इतिहास को उद्घाटित करने में व्यस्त थी। उनके परिवार की प्रत्येक महिला की चारित्रिक व्याख्या प्रस्तुत कर चुकने के बाद वह सोचने लगी , 'हरामजादा---- आज मुझ बूढ़ी पर इल्जाम लगाने चला है---- लेकिन मैंने भी गांव सभा के सामने उसकी इज्जत न धो दी तो अपने बाप की औलाद नहीं--- याद दिलाऊंगी पापी को उस दिन की जब घास छीलने वाले हाथ का भरपूर तमाचा मारा था उसके गाल पर--- भूल गया होगा बदमाश---- भूला नहीं---- यह उसीका बदला ले रहा है।’
’समझता होगा आज मैं अकेली हूं---- न आदमी, न बेटा-बेटी--- मुझे कमजोर जान दबा लेगा--- गांव से निकालकर मेरा दस बिसवे का खेत हथिया लेगा--- मैं खूब समझती हूं उसकी चाल---- पुरानी पापी ठहरा--- सभी तो जानते हैं उसको---फिर पता नहीं क्यों गांववाले उसे देवता समझने लगे---- ’
"कौन किसे मूरख बनाये रहता है चाची?" पुसुआ ने पूछा तो फुलना अचकचा गयी।
"सुना तुमने भी होगा बबुआ---- आज गांव सभा के सामने लल्लन पंडित मुझे बेइज्जत कर गांव से निकल जाने की सजा देंगे।"
"सुना है---लेकिन ऐसा हम सब न होने देंगे--- चाहे जो कुछ हो जाये----। आज आपके खिलाफ --- तो कल एक-एक कर हम सभी के खिलाफ वह इसी तरह की बातें करेंगे…।"
"लेकिन गरीबन की कोई आवाज नहीं होती बबुआ।"
"चाची---- गरीब जब उठ खड़े होत हैं--- तब सब कुछ बदल भी देत हैं…। आज आप देख्यो---।"
"पूसू--- तुम सब ---मेरे खातिर---।" भावातिरेकवश फुलना आगे न बोल पायी।
"हां चाची---- हम सबने पता लगा लिया है---- उसमान चाचा दस दिन से बुखार में पड़े तड़प रहे हैं ---सचाई का है---- हम सब जानत हैं---- तुम चिन्ता न करौ---- सारा मोहल्ला तुम्हरे साथ चलिहै--।"
धुशी से फुलना की आंखों से आंसू छलक आये।
शाम को लल्लन मंडित के घर के बाहर खुले मैदान में सारा गांव इकट्ठा था। ठाकुर- ब्रम्हणों का समूह एक स्थान पर, शेष प्रत्येक जाति के लोग अपने मोहल्ला वालों के साथ बैठे थे। एक ओर दो तख्तों पर दरियां बिछाकर लल्लन पंडित और गांव के पंच विराजमान थे। कुछ छतों से स्त्रियां और बच्चे उचक-उचककर कार्रवाई देखने-सुनने की कोशिश कर रहे थे।
लोग आपस में खुसुर-फुसुर कर रहे थे। लल्लन पंडित गंभीर मुद्रा में विचार मग्न थे। तभी एक पंच ने उन्हें बोलने के लिए कहा।
चारों ओर दृष्टि डालने के बाद लल्लन पंडित ने उसमान और फुलना के विरुद्ध आरोप सुनाया और प्रत्यक्षदर्शी के रूप में अपने को बताया। कुछ देर वह लोगों की प्रतिक्रिया देखते रहे, लेकिन लोग चुप एक-दूसरे की ओर देख रहे थे।
कुछ देर बाद लल्लन पंडित फिर बोले, "ऐसे अनाचारियों को क्या सजा दी जाय, इसी के लिए हम सब यहां एकत्र हुए हैं?"
"पंडित जी आपके अलावा वहां कोई और भी था जिसने उन दोनों को देखा हो?" रमजानी ने पूछा।
"क्या आपको मेरी बात में यकीन नहीं?"
"यकीन कैसे हो---- जब उसमान मियां दस दिन से बुखार में तड़प रहे हैं तब वह कल खलिहान में कैसे पहुंच गये---- सुबह?" हकीम रहमतुल्ला खां का स्वर कुछ तेज था।
"यह सब बेकार की बातें मत करो--- कहां हैं उसमान --- पेश करो उन्हें।" लल्लन पंडित के साथ भोला सिंह बोले।
"वह घर में चरपाई पर---- बीमार---।"
"हां बीमार हैं…।" उसमान मियां के मोहल्ले वालों का समवेत स्वर गूंजा।
पंच एक-दूसरे की ओर देखने लगे। भीड़ में फुसफुसाहट के स्वर तेज हो उठे थे। तभी फुलना चीखती भीड़ को चीरती आगे बढ़ी और तख्त के सामने आ खड़ी हुई। लल्लन पंडित उसे देखते रह गहे। उनके चेहरे पर जनरें गड़ाकर फुलना बोली, "पंडित , कितने बरस पुराना बदला ले रहे हो मुझसे ?"
"क्या बक रही है--- जुबान संभालकर बोल।"
"याद नहीं --- शहर जाने से दो साल पहले तूने मुझे पतिपाल भैया के खेत में घास छीलते समय आ घेरा था---- बुरी नीयत से -- तब मैं बई हट्टी-कट्टी थी--- एक जोरदार तमाचे में ही तुम्हारा गाल सूज गया था---- और जब मैंने शोर मचाकर लोगों को इकट्ठा करना चाहा तब तुमने हाथ जोड़कर माफी मांगी थी--- पैर पकड़ने चाहे थे---- और यह बात किसी से न कहने की कसम दिलाई थी---- आज उसी का बदला ले रहे हो---- लेकिन मत भूलना-- फुलना आज हट्टी-कट्टी न सही---- पर कमजोर भी नहीं है।"
लल्लन पंडित के पसीना छूट आया। इधर-उधर देखने के बाद वह चीखने का नाटक करते हुए बोले, "बकवास बन्द कर तू---- और आज ही गांव छोड़कर कहीं और मुंह काला कर।"
"फुलना चाची कहीं नहीं जायेंगी पंडित---- और न ही उसमान चाचा जायेंगे कहीं---- भलाई इसी में है कि आप ही अपना मुंह काला करें जाकर कहीं।" पुसुआ चीखा।
रमजानी और रहमतुल्ला खां भी एक स्वर में बोले, "पुसुआ ठीक कह रहा है…।"
लल्लन पंडित कुछ बोल नहीं सके। हकबकाए-से लोगों को देख रहे थे. उनके कानों में कितनी ही आवाजें गूंज रही थीं – “पुसुआ ठीक कह रहा है----पुसु---आ”
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