Thursday, 15 September 2011

कहानी - ९

रसोइया
रूपसिंह चंदेल

उसका चेहरा मुर्झाया हुआ था। बाल रूखे थे, शायद हफ्तों से उनमें तेल नहीं पडा़ था । उसने हल्के पीले रंग की मैली कमीज पहनी हुई थी। कमीज कई जगह से फटी हुई थी। टांगों को उसने एक फटे पायजामे से ढक रखा था। फटी जगह मोटे धागे से सिलाई की हुई थी। उसके हाथ में एक गन्दा झोला था। अपनी निस्तेज आंखों से एकटक देखते हुए निकट आकर उसने मुझे नमस्ते की। एक क्षण के लिए उसके कदम ठिठके, किन्तु न जाने क्या सोचकर वह आगे बढ़ गया . कुछ दूर जाकर उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा और फिर बाजार की ओर जाने वाली सड़क की ओर मुड़ गया .

मैं उसे जाता हुआ तब तक देखता रहा जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गया।

प्रतिदिन मैं फक्ट्री से लौटकर कमरे के बाहर कुर्सी डालकर कोई-न कोई पुस्तक पढ़ने बैठ जाता था। उस दिन के बाद अब पास से गुजरते हुए वह मुझे नमस्ते करने लगा था। नमस्ते का जवाब देते समय मैं एक क्षण के लिए पढ़ रही पुस्तक से दृष्टि हटाकर उसकी ओर देखने के लिए विवश हो जाता। जब तक बाजार की ओर जाने वाली सड़क पर वह मुड़ नहीं जाता, मैं बिना पढ़े उसके विषय में ही सोचता रहता। धीरे-धीरे मैं ऎसा अनुभव करने लगा था कि सोचने के लिए मेरे पास जितने भी विषय हैं उनमें एक विषय की बढ़ोत्तरी हो गयी है। रोजाना वह शाम के समय वही फटी कमीज और पायजामा पहने बाजार जाता और उस गन्दे झोले में ढेर-सी सब्जियां ठूंसे चुपचाप लौट आता। शायद यही उसकी दिनचर्या थी या इसके अतिरिक्त भी वह कुछ करता था, मुझे ज्ञात न था।
लगातार कई दिनों से मैं उसे देख रहा था, किन्तु एक दिन भी मैंने उसके चेहरे पर खुशी की झलक न देखी थी। मुझे वह चलती-फिरती जिन्दा लाश की तरह प्रतीत होता था।

उस दिन बाजार जाते समय वह मेरे पास आकर ठिठक गया और नमस्ते की। हर दिन की भांति ही उसके स्वर में उदासी थी. पुस्तक से दृष्टि हटाकर मैंने उसे देखा। रोजाना की हालात में वह सामने खड़ा था। मैं कुछ पूछता उससे पहले ही उसने पूछ लिया, "बाबूजी आप इहां नए आये हो ?"
"हां---- नया हूं।"
वह कुछ सोचने लगा। शायद पुनः प्रश्न करने का साहस जुटा रहा था या यह सोच रहा था कि अब क्या पूछा जाय। चुप्पी तोड़ते हुए मैंने पूछा, "यहां क्या करते हो?"
"मेस मा खाना बनाइत है बाबू।"
"---- क्या यहां मेस भी है?"
"हां---- वो सामने की बिल्डंग है न, ओही मा  है।"
"क्या मैं भी मेम्बर बन सकता हूं?" मैंने कुछ उत्सुकता से पूछा।
"हां---- हां जरूर, लेकिन मुनीशर दा से पूछे का पड़ी। वो ही मेस के इंचारज हैं।"
"ठीक है---- उनसे पूछकर बताना।"
मुझे लगा जैसे मेरे प्रस्ताव से वह प्रसन्न हुआ था।
"जरूर  बाबू साब।"
मुझे विश्वास हो गया कि अब भोजन की समस्या सुलझ जायेगी। जब से यहां आया था, ठहरने की व्यवस्था तो फैक्ट्री द्वारा बनाए गये ’एप्रेण्टिसेज होस्टल’ में हो गयी थी, किन्तु खाने की ठीक व्यवस्था न हो पायी थी। अच्छे होटल के अभाव में आधा पेट रह रहा था।
दूसरे दिन शाम बाजार जाते समय वह मेरे पास आया। पूछने पर उसने बताया कि मुनीशर दा ने मेंबर बनाना मान लिया है। रात में वह मेरी मुलाकात उनसे करवा देगा।
मैं स्टेशन रॊड पर स्थित एक सामान्य से होटल, जिसे ढाबा कहना अधिक उचित है, में भोजन करता था ।   उस दिन वहां से जल्दी लौट आया और उसके आने की प्रतीक्षा करने लगा। रात दस बजे के लगभग वह आया और मुझे मेस में ले गया। मेस में एक लम्बे-चौड़े बड़ी-बड़ी आंखों वाले सज्जन भोजन कर रहे थे। उसने कहा, "यही हैं मुनीशर दा।"
मुनीशर दा को नमस्कार कर मैं पास की बेंच पर बैठ गया। बातों का सिलसिला उन्होंने ही शुरू किया।  उनका पूरा नाम ’मुनीश्वर वन्दोपाध्याय’ था. फैक्ट्री में सहायक प्रबन्धक थे. एक बार पेरिस भी घूम आए थे. बयालीस-तैंतीलीस वर्ष के लग रहे थे, लेकिन उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि वह अभी तक ’बैचलर’ हैं । हंसते हुए मुझे भी  सलाह दी, "अभी शादी-वादी के चक्कर में मत पोड़ना। दुनिया का मजा लो ….मजा।"

********
दूसरे दिन से मैं मेस में भोजन करने लगा। उसी दिन मुझे पता चला कि उसका नाम सियाराम था। मुझे जोड़कर अब मेस में भोजन करने वालों की संख्या अठारह हो गयी थी। दोपहर लंच के समय वहां अच्छा खासा शोरकुल होता था। सियाराम उस समय निकर और बनियाइन में दैड़-दौड़कर खाना परोस रहा होता था. कभी वह प्लेट में चपाती लिए किसी की ओर लपकता दिखाई देता तो क्षणभर बाद ही उसके हाथ में चावल, सब्जी या दाल दिखाई देती. कुछ लोग ऎसे थे, जिन्हें अण्डे की सब्जी या मछली विशेष पसन्द थी. जिस दिन ये चीजें न होती, वे हंगामा खड़ा कर देते, "क्यों बे उल्लू का पट्ठा , तुमी आज मछली क्यूं नई पकाया ---- स्साला कितना दफा बोला, मेरे वास्ते अण्डा जरुर होना मांगता पर ये ससुरा आलवेज अपने मन का करता है---- अरे बाबा पैसे की कमी है तो बोलता क्यूं नईं." लेकिन सियाराम बिना कुछ बोले इधर से उधर दौड़ता दिखाई पड़ता.

मुनीशर दा का सभी सदस्यों पर काफी रोब-दाब था। सियाराम तो उनकी कठपुतली-सा था। वह जो भी कहते, उसे करना पड़ता। लंच के समय मुनीशर दा कुछ देर आराम किया करते और सियाराम उनके पैर दबाया करता । दरअसल वह एक ’कोआपरेटिव’ मेस था, जिसके संचालक मुनीश्वर दा थे। वही सियाराम को वहां लाये थे। सियाराम को उन्होंने लगभग अपना व्यक्तिगत नौकर बना रखा था, इसीलिए अपने सारे काम उससे करवाया करते थे।

एक दिन एकान्त पाकर मैंने सियाराम से पूछा, "यहां क्यों फ़ंसे हुए हो सियाराम---- कोई छोटा-मोटा धन्धा क्यों नहीं कर लेते?" इस पर उदास होता हुआ वह बोला, "कहां जाई बाबू? धन्धा के लिए तो पैसा चाही. बहुत भटके हैं, लेकिन कोई नौकरी भी नाहीं मिलत."

बात ठीक  थी। ना पैसे  छोटा-से छोटा धन्धा भी नहीं किया जा सकता. नौकरी की समस्या और भी गंभीर है. मैंने पिर पूछा, "खाने-पीने के अलावा जो पैसा तुम्हें मिलता है उसको जोड़ते नही?"
"पैसा मिलतै कहां हैं बाबू।"
"क्यों?"
"हमने एक बार हजार रुपिया मुनीशर दा से लेकर गांव भेजा रही, सो तब से एको पैसा तनखा नहीं मिली. डेढ़ साल से ऊपर हुई गवा."
मैं चुप हो गया था.
*****
उस दिन सोने की तैयारी कर रहा था कि अचानक सियाराम घबड़ाया हुआ कमरे में आया. उसने अपने हाथ में अन्तर्देशीय पत्र थाम रखा था. मैंने पूछा, "क्या बात है सियाराम, कुछ घबड़ाए हुए दिखाई दे रहे हो?’
बिना कुछ बोले उसने अन्तर्देशीय मेरी ओर बढ़ा दिया.पत्र लेकर मैने पुनः पूछा, "बात क्या है?"
"का बताई बाबू चारों तरफ से आफत-ही आफत आ रही है. ई खत मा बड़े भाई ने लिखा है कि एक हजार रुपिया भेज दो नहीं तो अपनी मेहरारू लिवा ले जाओ । बताओ बाबू का करी ?" रुआंसे स्वर में वह बोला।  वह मुझे अपना आत्मीय समझने लगा था।
"क्या तुम्हारी शादी भी हो गयी है?" मैंने साश्चर्य पूछा।
मेरे इस प्रश्न से वह कुछ शरमा गया।
’मुनीशर दा से पूछा था? क्या कह रहे थे?" मैंने बात बदल दी।
"उनको कल बंगला मिल गया है। आज उसमें चले गये हैं।---- कह रहे थे लिवा लाओ---- बंगले में कुछ सफाई-वफाई का काम कर दिया करेगी।"
"लेकिन---- खर्च कैसे चलाओगे?
"मुनीशर दा कह रहे थे कि बबनी भी मेस मा खाना खा लिया करेगी---- और अब तनखा भी मिला करेगी ---- साइद पैसा अब अदा हुइ गया है।"
"ठीक है लिवा लाओ। तुम्हें भी आराम हो जायेगा।"
दूसरे दिन ही वह पत्नी को लेने चला गया.  पांचवें दिन वह पत्नी को लिवा लाया और मेस के पास बने ’सर्वेंट क्वार्टर’ में रहने लगा. पत्नी के आने के बाद उसकी हालत भी सुधरने लगी. अब उसके बालों में तेल पड़ने लगा था. फटी कमीज का स्थान नई कमीज ने ले लिया था.पायजामा की जगह अब वह पुराना पैण्ट पहनने लगा था.
एक दिन मुनीश्वर दा लंच करने नहीं आए. उस दिन भोजन करके मैं मेस में पड़ी चारपाई पर कुछ क्षण के लिए आराम करने लगा.मेस के अन्य सदस्य जा चुके थे. सियाराम चारपाई के पास जमीन पर आकर बैठ गया. अब वह प्रयः खुश ही नजर आता था. सभी से हंस-हंसकर बातें करता था.
"आजकल कैसा चल रहा है सियाराम?" मैंने पूछा.
"बस ठीक -ठाक चल रहा है बाबू." गदोली पर तम्बाकू मलते हुए वह बोला .
"अब तो तनखा मिलने लगी है न!"
"हां बाबू."
कुछ देर तक हम दोनों ही चुप रहे. वह पूर्ण मनोयोग से तम्बाकू मल रहा था. तम्बाकू को मसूढ़ों के पास दबाकर कुछ दबी-सी जुबान से उसी ने कहना शुरू किया, "बाबू जी, मुझे जो सौ रुपिया मिलते हैं उससे तो खर्च पूरा होता नहीं. बबनी(पत्नी) शाम को मुनीशर दा के बंगले की सफाई कर आती है,जिससे उसे भी पचास रुपिया महीना उन्होंने बांध दिया है. मुनीशर दा ने उसे एक साड़ी और मुझे एक पैण्ट का कपड़ा भी दिया है."
"यह सब तो ठीक है---- अब कुछ पैसे जोड़कर तुम धन्धा---- सब्जी-वब्जी की दुकान या कुछ और---- शुरू करो. कब तक ऎसे काम चलेगा. आज दो हो कल को तीन----."
शर्माते हुए कुछ देर बाद वह  बोला, "सो तो हमहूं सोचित है बाबू. लेकिन पैसा अभी बच नहीं पावत. " उसका चेहरा क्षण भर के लिए उदास हो गया था.
*******
महीने का आखिरी दिन था। वेतन मिला था। वेतन के दिन मैं मेस का हिसाब मुनीश्वर दा को चुकता कर दिया करता था। उस दिन शाम  मेस का हिसाब करने के लिए मैं उनके बंगले की ओर गया। दूर से ही वहां का दृश्य देखकर मैं स्तब्ध रह गया। मुनीश्वर दा और सियाराम एक-दूसरे में गुंथे हुए थे।मुनीश्वर दा के लम्बे-चौड़े और भारी-भरकम शरीर के सामने नाटे कद का सियाराम नन्हा-सा दिखाई पड़ रहा था। किन्तु  उसमें बला की स्फूर्ति दिखाई दे रही थी। यदि चार हाथ मुनीश्वर दा उसे मारते तो अपने को बचाता हुआ एक हाथ वह भी उनके मारता जा रहा था।
अजीब दृश्य था । जिस सियाराम को मैंने मुनीश्वर दा के सामने भीगी बिल्ली की तरह देखा था उसे इस प्रकार उनके ही साथ मारपीट करता देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। ऎसी कौन सी बात थी जिससे उसने मुनीश्वर दा पर हाथ चला दिया । मैंने तो अभी तक उसे एक ऎसा व्यक्ति समझ रखा था, जिसकी अपनी कोई वाणी नहीं होती. जो पारिस्थितियों की झंझावातों में पड़कर अपने अस्तित्व तक को भूल जाते हैं। घटना की वास्तविकता जानने के लिए मैंने जल्दी-जल्दी साइकिल के पैडल चलाने शुरू कर दिये.

बंगले के निकट पहुंचकर मेरी दृष्टि सियाराम की पत्नी पर पड़ी. वह एक कोने में खड़ी कांप रही थी. उसकी धोती कई जगह फट रही थी और शरीर में खरोंच के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. उसके नेत्रों से अविरल आंसू बह रहे थे.

मुनीश्वर दा ने सियाराम को गेट से बाहर निकल जाने के लिए धक्का दिया । वह गेट के पास जाकर रुक गया और बोला, "दादा, मैं गरीब जरूर हूं, लेकिन इज्जतवाला हूं। मुझे नहीं मालूम था कि आप इतने गिरे हुए----।"

उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही मुनीश्वर दा ने चीखते हुए कहा, "चोप्प स्साला, मुझ पर झूठा इल्जाम लगाता है। निकल जा यहां से । खबरदार, जो मेस में कदम रखा।" वह क्रोध से कांप रहे थे।

"इल्जाम--- देखो बाबू, बड़ा दूध का धुला बन रहा है आपके सामने।" मेरी ओर मुखातिब होकर सियाराम बोला, "बाबू, मुझे नहीं मालूम था कि इसके मन में पाप है---- वह तो मैं आज बबनी को लेने जरा जल्दी आ गया---- उसकी चीखें सुनकर अन्दर पहुंचा तो देखा यह राक्षस उसे नोंचने की कोशिश कर रहा था।"

"चोप्प बदमाश---- निकल जा यहां से नहीं तो अभी सिर फोड़ दूंगा।" मुनीश्वर दा फिर गरज पड़े थे। मैंने देखा उनके हाथ में लोहे का तीन-चार फुट लम्बा रॉड था।

"सिर आप क्या---- पहले मैं ही फोड़ दूंगा।" सियाराम ने पैरों के पास पड़ी सरिया उठा ली। वह मुनीश्वर दा की ओर लपका । मुनीश्वर दा अपने स्थान पर खड़े थे। कहीं दोनों एक दूसरे पर प्रहार न कर दें सोचकर मैं जल्दी से साइकिल से उतरा और उधर बढा़। अभी मैं गेट के पास पहुंचा ही था कि देखा मुनीश्वर दा पीछे हटने लगे थे और सियाराम आगे बढ़ता जा रहा था। क्षण भर बाद ही मैंने देखा मुनीश्वर दा भाग खड़े हुए थे। पिछले गेट से वह कहां चले गये, पता नहीं चला।

सियाराम ने सरिया वहीं फेंक दी। मेरी ओर मुड़कर बोला, "बाबू, मुझसे गलती हुई हो कभी तो माफ करना...." इसके आगे वह कुछ बोल नहीं सका । उसका स्वर भीगा हुआ था। उसने पत्नी को आवाज दी और उसे लेकर तेजी से वहां से चला गया। मैं हत्प्रभ उसे जाता हुआ देखता रहा। उसके बाद वह मुझे वहां कभी दिखाई नहीं पड़ा।

’जनयुग’ (नई दिल्ली) १९७९ के अंत में कभी प्रकाशित
’अजगर तथा अन्य कहानियां’ (१९८८) से

Sunday, 11 September 2011

कहानी - ८

अनि दा
रूपसिंह चन्देल

पत्र मेरी उंगलियों में दबा था। तीन बार पढ़ चुकने के बाद भी लग रहा था कि यह सब उन्हॊंने नहीं लिखा होगा। लेकिन जो कुछ सामने था उसे झुठलाया भी नहीं जा सकता था।
मैं निढाल हो कुर्सी में लेट गया और उनके बारे में---- उस दिन के बारे में सोचने लगा। उस दिन कड़कती ठंड के बावजूद उनके माथे पर पसीना  चुहचुहा रहा था. चेहरे पर किसी अनिष्ट की आशंका की काली छाया उतर आयी थी और पीले कंचे जैसी उनकी बड़ी और चमकती आंखें सामने दीवार पर लटकते कलैंडर पर चस्पा होकर रह गयी थीं।
कितनी ही देर तक वह उसी मुद्रा में बैठे कुछ सोचते रहे। उस समय उन्होंने काली पैंट, सफेद शर्ट और काला कोट पहन रखा था। मफलर को गले में लपेटकर खुबसूरती के साथ आगे मोड़ कोट के कालर के पास अंदर डाला हुआ था।
कुछ सोचते रहने के बाद उन्होंने नजरें उधर हटाकर मुझ पर स्थिर कर लीं। जेब से सिगरेट निकाली, जलायी और होठों में दबाकर हल्के-हल्के दो कश खींचे। धुआं छत की ओर फेंक धीमे स्वर में बोले, "कुछ सोचा तुमने?"
"………."
"तुम सोच नहीं सकते रवि----- कल जब उन्हें पता चलेगा---- वे पूरी तैयारी के साथ मुझे घेरने की कोशिश करेंगे...... किसी शिकारी की भांति।"
"मैं उस स्थिति का अनुमान लगा सकता हूं अनि दा-----"
"फिर कुछ करो----- वर्ना वे मुझे नोंच खायेंगे।" उनके स्वर में कंपन था।
"वे कितने होंगे?"
"तीन….. चौथा भी हो सकता है---- सबसे अधिक खतरा मुझे कन्हैयालाल और पठान से है। भनक मिलते ही ये घर के चारों ओर मंडराने लगेंगे ---- लाश के इर्द-गिर्द मंडराते गिद्धों की भांति।"
"चार के अलावा भी तो होंगे---- जिनसे आपने----."
उन्होंने बात बीच में ही काट दी, "एक और है मछली वाला घोषाल----."
"उसे कितने देने हैं?"
"दो सौ सत्तर---- लेकिन उसकी चिन्ता तुम न करो---- उसे मैं देता जाऊंगा---- जो एलाउन्सेज मिलेगें--- उससे---- बाकी के बारे में तो तुम जानते ही हो-----."
"मैं जानता हूं अनि दा---- इसीलिए तो----"।
वह बीच में ही बोल पड़े, "मुझे तुम्हारा ही सहारा है ---- जैसे भी हो तुम मेरी मदद करो----- सुरक्षित यहां से निकाल दो----"
"ट्रांसफर की बात किसी को मालूम तो नहीं हुई?"
"नहीं---- मैंने एडमिन अफसर और एडमिन के सेक्शन अफसर बनर्जी से अनुरोध किया है कि वे इसे किसी पर तब तक स्पष्ट न करें  जब तक मैं दफ्तर से चला न जाऊं---- और उन दोनों ने मेरा अनुरोध स्वीकार कर लिया है।"
"--------"
"रवि, इतने वर्षों में यहां जितना खोआ है, कलकत्ता जाकर अधिक नहीं तो वह सब तो वापस पा ही सकता हूं। वहां जीवन को एक बार फिर व्यवस्थित करने की कोशिश करूंगा---- बस तुम मुझे यहां से सुरक्षित निकाल दो---- उन दरिन्दों के हाथों लग गया तो----।" उनके स्वर में दहशत स्पष्ट थी।
"आप एक काम कर सकते हैं?"
"बोलो।" वह उत्सुक हो उठे और कुर्सी पर तनकर बैठ गए।
"रात में ही सारा सामान बांध लीजिए---- सुबह पांच बजे मैं रिक्शा लेकर पहुंच जाऊंगा। भाभी और बच्चे को शोभाराम के साथ पहली बस से दिल्ली भेज देगें----आप ट्रांसपर ऑर्डर और पैसा लेकर दोपहर चुपचाप अरमिन्दर के साथ बस से दिल्ली पहुंच जाइयेगा----- उसे मैं सामझा दूंगा। उस पर भरोसा किया जा सकाता है, और मैं सामान लेकर बारह बजे की गाड़ी से निकल आऊंगा----- किसी को पता भी नहीं चलेगा।“
योजना सुन उनका चेहरा खिल उठा था.
"मैं जानता था तुम कोई न कोई उपाय निकाल ही लोगे---- तभी तो---- लेकिन सामान किसमें पैक करूं?" वह फिर चिन्तित हो उठे थे।
"कितना होगा?"
"अधिक तो नहीं है----फिर भी छोटे-मोटे आइटम मिलाकर ---- कुछ तो हो ही जायेगा।"
"अटैची-ट्रंक---- कुछ भी नहीं?"
"-------"
उनकी चुप्पी का अर्थ मैं समझ गया। उन्होंने एक-एक कीमती सामान कर्ज का ब्याज चुकता करने में बेच दिया था। मैंने पलंग के नीचे से ट्रंक निकाला, खाली किया और बोला, "इसे लेते जाइये----- अति आवश्यक चीजें, कपड़े वगैरह इसमें रख लीजियेगा --- बोरा होगा कोई या----।"
"शायद होगा।"
"फिर चलिए---- ग्यारह बजने को हैं।" मैंने घड़ी देखी और उठ खड़ा हुआ।
"तुम कहां?"
"शोभाराम और अरमिन्दर को इस योजना के बारे बताने।"
वह चुप रहे। मैंने दरवाजा बन्द किया और उनके साथ सीढ़ियां उतरने लगा। उस समय सड़क के किनारे के नीम के पेड़ पर कोई परिन्दा पंख फड़फड़ाता कुड़कुड़ा रहा था। ठंड बढ़ गई थी और पेड़ से कुहासा टपकने लगा था।
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अनि दा का नाम था अनिरुद्ध मुखर्जी। चमकदार सुनहला रंग, पांच फीट चार इंच के लगभग लंबाई , कसा-भरापूरा शरीर, चौड़ा चेहरा और बड़ा सिर---- बौद्धिक होने का प्रमाण देती, चमकदार आंखें---- बगला, अंग्रेजी और हिन्दी का अच्छा ज्ञान--- समान अधिकार---- बातचीत में किसी को भी प्रभावित कर लेने की क्षमता थी उनमें। जब वह उस दफ्तर में पोस्ट होकर आए तो सभी उनके ज्ञान और विद्वत्ता से चमत्कृत थे। और अपने ही खोल में सिमटे रहने वाले और सीमित जानकारी के बल पर अपने को दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञाता मानने वाले उस छोटी जगह के छोटे से दफ्तर के बाबुओं के लिए अनि दा आकर्षण का केन्द्र बन गये थे। वहां के बंगाली परिवारों में कम दिनों में ही बहुचर्चित----  अनि दा भी वहां के वातावरण में आनन्द लेने लगे थे।
और जब लोगों को पता चला कि उनकी योग्यता साधारण नहीं---- क्योंकि उसके पीछे गहन अध्ययन रहा है---- अध्ययन, जो उन्होंने आई०ए०एस० की परीक्षा की तैयारी के लिए किया था..... वह परीक्षा में उत्तीर्ण भी हो गए थे, लेकिन साक्षात्कार में इसलिए नहीं चुने गए, क्योंकि वह उन दिनों बोकरो स्टील फैक्ट्री में क्लर्क थे, और साक्षात्कार बोर्ड में बैठे लोग आभिजात्य मानसिकता वाले थे---- ऊंचे अफसर-विशेषज्ञ।
चेयरमैन ने पूछा था, "क्लर्क के रूप में काम करते हुए तीन वर्ष बीत गए हैं ---- आई०ए०एस० का पद संभाल पाओगे?"
उनकी विद्वत्ता और परिश्रम व्यर्थ सिद्ध हुए थे।
अध्ययनशील होने के साथ-साथ वह संगीत प्रेमी थे---- अच्छे गायक भी । रवीन्द्र संगीत में उनकी विशेष रुचि थी और वहां प्रति शनिवार की रात किसी-न किसी के यहां इस तरह के आयोजन होने लगे थे। अनि दा तबला बजाते---- सिगरेट होंठों में दबा पूर्ण तन्मयता के साथ।
वहां के क्लब का सेक्रेटरी बना दिया गया था अनि दा को। सेक्रेटरी बनते ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन आरंभ हो गये थे। दुर्गापूजा के दिनों में रात-रात भर क्लब में रहकर नाटकों का निर्देशन भी करते और स्वयं अभिनय भी। वहां बंगाली उनके प्रति विशेष लगाव अनुभव करने लगे थे।
इस मध्य पीसीएस की विशेष परीक्षा में बैठने का उन्हें अवसर मिला । परीक्षा उत्तीर्ण कर ली उन्होंने, लेकिन साक्षात्कार में वह फिर न आ सके और क्लर्क बने रह्ने के लिए अभिशप्त होकर रह गये। अब उनमें एक वैचारिक परिवर्तन भी हुआ था। वह पहले सोच रहे थे कि अफसर बनकर ही शादी करेंगे, लेकिन अब सोचने लगे थे कि उन्हें शादी कर ही लेनी चाहिए------ और इसी उद्देश्य से एक दिन वह कलकत्ता  गये थे।
********
तीन महीने बाद लौटे थे अनि दा कलकत्ता से---- अकेले नहीं---- पत्नी सहित। रेलवे अधिकारी की बेटी थी उनकी पत्नी---- पढ़ी-लिखी ---- स्वस्थ सुन्दर---- झील-सी नीली आंखों वाली। शादी कर लौटने के बाद अनि दा जीवन का रंग-ढंग ही बदल गया था । दफ्तर के बाद अनेक कार्यक्रमों में व्यस्त रहने वाले अनि दा की दिनचर्या उलट गयी थी। अब वह दफ्तर और घर के मध्य ही सीमित होकर रह गये थे। रात में पत्नी के साथ टहलते हुए सड़कों पर अवश्य दिखते----- शेष लोगों से मिलना-जुलना उन्होंने बन्द कर दिया था। क्लब के सदस्य जब कभी उन्हें घर बुलाने पहुंचते, कोइ-न कोई खूबसूरत बहाना बनाकर टाल देते---- अंततः एक दिन उन्होंने  क्लब के सेक्रेटरी पद से त्याग पत्र दे दिया था।
पत्नी का संग-साथ पा वह प्रसन्न थे। लेकिन दफ्तर में प्रायः चुप रहने लगे थे। या तो सीट का काम करते या सिगरेट फूंकते रहते। सहयोगी बाबू छेड़छाड़ करते---- पत्नी के बारे में कुछ पूछते ---- वह हंसकर टाल देते। बाबू लोग अटकलें लगाते----- शायद दादा खुश नहीं हैं---- या कुछ और बात है---- लेकिन वास्तविक बात तक कोई पहुंच न पाता।

जबकि वास्तविकता यह थी कि शादी के बाद उनके खर्चे अकस्मात बढ़ गए थे---- यही उनकी परेशानी का कारण था। उन्होंने  शादी के समय ससुराल वालों को बताया था कि वह ’सेक्शन आफीसर’ हैं और अच्छा वेतन पाते हैं । और उस स्तर को बनाये रखने के लिए वह कटिबद्ध थे। कलकत्ता से लौटते ही उन्होंने डबल बैड, सोफा , आल्मारी आदि सामान खरीद लिया था।  वह प्रति रविवार दिल्ली घुमने जाने लगे थे। सुबह की गाड़ी से जाते और घूम-पिरकर---- कोइ पिक्चर देखकर रात की गाड़ी से लौट आते. दिन का खाना दिल्ली के किसी रेस्तरां में और रात का लौटकर स्टेशन के पीछे पंडित के होटल में खाते. प्रतिदिन मछली बनना आवश्यक हो गया था उनके घर. स्कूटर  न खरीद सके थे वह, लेकिन दफ्तर आने-जाने के लिए नई हीरो साइकिल अवश्य ले ली थी.

कुछ दिनों में ही स्थिति यह हो गई थी उनकी कि वह सीट पर भी कम ही बैठने लगे थे। लेकिन काम उनका अप-टु-डेट रहता था। वह अपनी चमचमाती साइकिल में उचकते हुए आते---- आधा घंटा बैठते और साढ़े नौ बजे साइकिल उठा मछलीवाले की ओर दौड़ जाते। मछली लेकर घर जाते और पत्नी की थोड़ी मदद कर साढ़े ग्यारह बजे तक दफ्तर लौट आते। दोपहर में लंच के लिए जाते तो ढाई से पहले न लौटते।

उनकी इस गतिविधि से उनका ’सेक्शन अफसर’ तंग रहने लगा था। उसने एक-दो बार टोका तो कुछ दिनों के लिए अनि दा ने अपनी गतिविधि में सुधार किया, लेकिन बाद में फिर वही स्थिति. सेक्शन अफसर दुखी हो गया.

लेकिन उससे कहीं अधिक दुखी अनि दा थे. वह भयंकर तनाव से गुजर रहे थे. अपने द्वारा तैयार किए गये झूठ के जंगल में वह फंस गए थे, जहां कांटे ही कांटे थे. एक झूठ को छुपाने के लिए निरतंर काबुली पठान का कर्जदार होते गए थे. वह  थिति को सम्भाल पाते इससे पहले ही पत्नी ने रहस्योद्घाटन किया कि वह मां बनने वाली है.मां बनने वाली है---- यानी पत्नी को अच्छी खुराक मिलनी चाहिए----- और इसके लिए उन्हें कन्हैयालाल का द्वार खटखटाना पड़ा था.

कन्हैयालाल ऎसे लोगों की मदद के लिए हर समय तैयार रहता था. उसने उन्हें सलाह दी कि पैसों की चिन्ता न करें, पत्नी को खूब ताकत की चीजें खिलाएं---- इन दिनों नहीं खिलाएंगे तो कब खिलाएगें.

अनि दा ने दिल खोलकर खर्च किया और कन्हैयालाल के तीन हजार के कर्जदार हो गए . इतना ही कर्ज वह पठान से ले चुके थे---- पूरा कर्ज दस प्रतिशत मासिक ब्याज पर. पत्नी ने बेटे को जन्म दिया तो बेटे के नाना-नानी , मामा-मौसी दौड़े आए कलकत्ता से और एक महीना रहे . उन दिनों मछलीवाला घोषाल भी कहने लगा था कि अनि मुखर्जी में ससुराल वालों को लेकर दुछ अधिक ही उत्साह आ गया है. पहले हर दिन आधा किलो मछली जाती थी, अब डेढ़-दो किलो  जाने लगी है.

इस प्रक्रिया में अनि दा को दो और लोगों से उधार लेना पड़ा था. उसके बाद से ही वह खोये-खोये से रहने लगे थे …. ब्लड प्रेशर’ के मरीज भी हो गए थे.

प्रतिमाह ब्याज के रूप में वह वेतन समाप्त कर घर लौटने लगे ---- उस पर भी एक-दो लोग रह जाते थे,जिनसे वह अपने को छुपाते घूमते. आखिर हारकर एक दिन उन्हें पत्नी पर वास्तविकता प्रकट करनी पड़ी थी. पत्नी ने उन्हें झिड़का था---- वह चुपचाप गर्दन झुकाए सुनते  रहे थे. फिर पत्नी ने अपनी जेवर---- घड़ी आदि उनके सामने फेंक दिए थे और कहा था, बेचकर कर्ज अदा कर दें. उन्होंने कुछ कर्ज अदा भी किया, लेकिन तब भी हालात न बदले थे.

उन्होंने औने-पौने में साइकिल, सोफा, डबलबैड---- आदि सामान पठान और कन्हैयालाल को बेच दिया. लेकिन इससे बमुश्किल उनका ब्याज ही अदा हो सका----मूल ज्यों का त्यों बना रहा. धीरे-धीरे अनि दा की स्थिति यह हो गई कि वह वेतन लेकर चुपचाप खिसक जाते और दो-चार दिन दफ्तर नहीं आते. पठान उनके घर पहुंचता तो वह बाथरूम में घुस जाते---- पत्नी कहीं बाहर जाने का बहाना कर देती. दप्तर जाते तो शक्ल दिखाकर दिनभर गायब रहते….कहां रहते---- किसी को पता न होता. अफसर से डांट पड़ती तो चुपचाप सुन लेते।

लेकिन कब तक छुपकर रहते वह। जब भी पकड़ में आते---- पठान या हन्हैयालाल के----- वे उनके चिपक जाते जोंक की तरह और जब तक कुछ ले न लेते---- छोड़ते नहीं थे। इस तरह उनके घर की एक-एक वस्तु उन लोगों के घर पहुंच गई---- बर्तन तक न बचे। अनि दा चीनी-मिट्टी की दो प्लेटें और एल्यूमिनियम के एक -दो बर्तन ले आए काम चलाने के लिए। डबल बैड चले जाने के बाद सारा परिवार जमीन पर सोने लगा था।

इतने दिनों में ब्याज के रूप में उन्होंने सूदखोरों को इतना सब दे दिया था---- जो मूलधन से कई गुना अधिक था..... अतः सुदखोरों से छुपकर उनका वहां से जाना मुझे अनुचित नहीं लग रहा था।
*******
हमारी योजना सफल रही थी। हम तीन बजे पुरानी दिल्ली स्टेशन की इंक्वारी के सामने मिले। मेरे पहुंचने से पहले ही उन्होंने दूसरे दिन के लिए ’जनता एक्सप्रेस’ में आअरक्षण करवा लिया था। चौबीस घंटे के लिए ’रिटायरिंग रूम’ में जगह मिल गयी थी उन्हें । इतना सब हो जाने के बादम मैंने अनि दा के चेहरे पर प्रसन्नता देखी थी -----  सूदखोरों के चंगुल से मुक्त हो जाने की प्रसन्नता ….।

*******
घड़ी ने टन-टन कर आठ बजाए तो मैं चौंका ----- मैंने बत्ती तक न जलायी थी----अंधेरे में ही बैठा था.

"तो इतने दिनों में ही अनि दा में इतना परिवर्तन---- एक छोटे से काम के लिए असमर्थता व्यक्त कर दी----- जबकि वह कर सकते हैं ---- हेडक्वार्टर के प्रशासन विभाग में ’ सेक्शन ऑफीसर’ हो गए हैं वह----- और उसी शाखा में हैं----- जिसने मेरा ट्रांसफर सिकंदराबाद कर दिया है ."

सिकन्दराबाद ट्रांसफर पर  जाने का अर्थ होगा आर्थिक संकट और बच्चों की शिक्षा की बर्बादी---- इसीलिए अनि दा को ट्रांसफर ‘ओर्डर निरस्त करवाने के लिए लिखा था।

"आय एम हेल्पलेस रवि" उनका  संक्षिप्त उत्तर हथौड़े की भांति मेरे सिर पर चोट कर रहा था ।

मैं क्षणभर तक पत्र की ओर देखता रहा, फिर उसकी चिन्दी-चिन्दी कर खिड़की से बाहर फेंक दिया। बाहर स्ट्रीट लाइट का दूधिया प्रकाश सड़ पर बिछा हुआ था और एक कुत्ता अपनी दाहिनी टांग ऊपर उठाए बिजली के खम्भे कॊ गीला कर रहा था।

’अजगर तथा अन्य कहानियां’ (१९८८)

Saturday, 10 September 2011

कहानी -७



अपराध-बोध

रूपसिंह चन्देल
बस में वह मेरे बगल की सीट पर बैठी थी। उस दिन उमस कुछ अधिक ही थी। बस चकेरी हवाई अड्डे के सामने अहिरवां के पास क्षण भर के लिए रुकी। बस रुकी तो अंदर और अधिक गर्मी महसूस हुई। मेरी ओर देखती हुई वह बुदबुदाई--"आज बहुत अधिक गर्मी है।"
मैं चुप रहा
"आपको कहां जाना है ?"
"खजुहा।" मैने कहा
"मैं वहीं की रहने वाली हूं। चलो अच्छा हुआ। एक से दो भले।" उनके चेहरे पर प्रसन्नता झलक रही थी।
जहानाबाद में बस के प्रवेश करते ही बोली थीं, "आपके ठहरने की व्यवस्था न हो तो...."।
"ठहरने की व्यवस्था तो शायद कॉलेज के मैनेजर साहब के घर में ही है।" मैने उत्तर दिया तो वह क्षण भर के लिए चुप हो गयीं। थोड़ी देर बाद बुझे स्वर में  बोलीं- "लेकिन वापस लौटने से पहले आप मेरे गरीबखाने में अवश्य तशरीफ लायें। गांव में लोग मुझे अन्न्पूर्णा के नाम से जानते हैं। मैं आपकी राह देखूंगी।"
रात  साढ़े आठ बजे बस जहानाबाद पहुंची। खजुहा वहां से लगभग तीन मील दूर था। एक जीप बस स्टॉप के बाहर खड़ी थी। ड्राइवर बैठा ऊंघ रहा था।
जीप के पास जाकर ड्राइवर को जगाया। आंखें मलता हुआ बोला-"तो साहब आप आ गये।" मैं कुछ कहूं, इससे पहले ही वह जीप से कूद कर एक दुकान की ओर दौड़ गया। मैं हत्प्रभ जीप के पास खड़ा रहा।
थोड़ी देर में ड्राइवर लौट आया। उसके साथ एक सज्जन और थे, जो अपनी धोती संभालते हुए जल्दी-जल्दी चले आ रहे थे। उन्होंने आते ही मेरे बिना पूछे अपना परिचय दे डाला कि वह उस कॉलेज में इतिहास के प्रवक्ता हैं।
जीप में पीछे बैठते हुए मुझे पीछे ही बैठने के लिए बाध्य किया। रास्ते भर वह अपने कॉलेज के मैनेजर नानकचन्द तथा प्राचार्य की ही बातें करते रहे.
नानकचन्द ने अपने घर में मेरे ठहरने का प्रबन्ध किया था। पहुंचते ही उन्होंने आगे बढ़कर स्वागत किया। कॉलेज के प्राचार्य जी भी वहीं थे। काफी देर तक बातों की औपचारिकता निभायी जाती रही।
दूसरे दिन सुबह उनके नौकर ने आकर मुझे जगाया। सात बज चुके थे। जल्दी तैयार हो रहा था कि आवाज आयी--"प्रोफेसर साहब, प्राचार्य जी नाश्ते में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"
नाश्ता करके जब मैं उठने लगा तब नानकचन्द मुझे एक बन्द लिफाफा थमाते हुए बोले--"यह कॉलेज की ओर से एक तुच्छ भेंट है। स्वीकार करें।"
लिफाफा खोला तो देखकर आश्चर्य हुआ कि नानकचन्द ने मुझे इतना गिरा हुआ समझ लिया है । मैं क्रोध से कांपने लगा। नानकचन्द का अभिप्राय मेरी समझ में आ गया था। मैंने चटपट सूटकेस में अपने कपड़े ठूंसे और उसके पास  पहुंचा।
मुझे देखते ही नानकचन्द बोले--"क्या बातहै प्रोफेसर साहब, आप कुछ परेशान से दिख रहे हैं। अरे----रे यह सूटकेश लेकर कहां चल पड़े।"
उन्होंने नौकर से कहा कि वह सूटकेस मेरे हाथ से ले ले। लेकिन मेरी मुद्रा देखकर नौकर का साहस नहीं हुआ कि वह आगे बढ़े । अब तक मैं अपने क्रोध पर काबू पा चुका था। फिर भी तेज स्वर में बोला-- "आपने मुझे इतना गिरा हुआ कैसे समझ लिया कि मैं इन कागज के टुकड़ों पर अपना ईमान बेच दूंगा। यह लीजिए अपनी भेंट।" और  लिफाफा उनकी मेज पर पटककर मैं मुड़कर चल पड़ा।
"आप समझते क्यों नहीं प्रोफेसर साहब ? उन लड़कों के भविष्य का प्रश्न है."
"मैं कुछ नहीं कर सकता इसके लिए."
"अच्छा आप पैदल मत जाइए कॉलेज ड्राइवर छोड़ आयेगा गाड़ी से."
"शुक्रिया." कहकर मैं तेजी से बाहर निकल गया.
दस बजे से एक बजे तक परीक्षा लेने के बाद पुनः तीन बजे से छह बजे तक का समय मैने शेष विद्यार्थियों के लिए निश्चित कर दिया. निर्बिघ्न कार्य समाप्त करके हाथ में सूटकेस लटकाये मैं खजुहा के छोटे से बाजार में होटल की तलाश में निकला.
लेकिन खजुहा के उस छोटे से बाजार में मुझे एक भी होटल नजर नहीं आया. मैं परेशान एक छोर से दूसरे छोरतक बाजार के दो चक्कर लगा आया. मुझे अन्नपूर्णा जी की याद हो आयी. याद आया कि उनके यहां जाने के लिए मैंने उनसे अस्पष्ट-सा वायदा  किया था. सोचा, क्यों न चलकर उन्हीं के यहा....

पूछता हुआ मैं अन्नपूर्णा जी के घर पहुंचा। मुझे देखकर वह अत्यधिक प्रसन्न हुईं। हर्षोत्फुल्ल हो वह बोली-_" सोच रही थी शायद आपको सुध न रही होगी। बड़ी खुशी हुई आपके आने से। सच, बड़े भाग्य से अतिथि घर में आते हैं।"
संकोचवश मैं कुछ नहीं बोला। वही बोलीं--"परीक्षा समाप्त कर आये ?"
"नहीं, अभी आधे लड़के शेष हैं."
"अच्छा आप बैठिये, मैं अभी चाय तैयार करके लाती हूं. फिर भोजन कीजिए."
"आप परेशान न हों. भोजन तो----." मैंने औपचारिकता दिखानी चाही. वह बोली--" यह नहीं हो सकता है. भोजन तो आपको करना ही होगा. इसमें परेशानी की क्या बात है ?”

चाय पीते हुए मैंने उन्हें गौर से देखा। उम्र लगभग साठ के आसपास। गौर वर्ण तथा चेहरे पर अभी भी तेज विद्यमान था। श्वेत परिधान में मुझे वह एक तपस्विनी से कम प्रतीत नहीं हुई। काफी बडा़ मकान था उनका। मैंने पूछा--"आप अकेली रहती हैं इसमें ?"
वह उदास हो गयीं दुछ क्षण बाद  संयत होकर बोली, "अकेली ही रहती हूं अब। बड़ा परिवार था मेरा किन्तु अब तो ससुराल और मायके में मैं ही अकेली बची हूं।" मैंने देखा उनकी आंखें गीली थीं।
"क्षमा कीजिएगा। मैंने यह सब  पूछकर शायद आपको कष्ट पहुंचाया."
"नहीं, ऎसी कोई बात नहीं." आंखें पोंछती हुई वह बोली."
भोजन करते समय उन्होंने बताया कि उनके दो भाई -- एक उनसे छोटा तथा एक बड़ा और एक छोटी बहन थे, जब उनकी शादी हुई थी. मां-बाप भी थे. उनकी ससुराल खजुहा से चार मील दूर थी. वहां उनकी सास और पति थे.
उनके भाई क्रान्तिकारी थे. सन १९४२ के आंदोलन के समय अंग्रेजों ने उन्हें  फांसी पर लटका दिया था.  आंखें पोंछती हुई बोलीं वह--"बड़े भैया की शहादत का समाचार सुनकर मेरी छोटी बहन राधा ने आत्महत्या कर ली थी और छोटा भाई थोड़े दिन बाद ही क्षय रोग का ग्रास बन गया था. भैया की मृत्यु के कुछ दिन बाद ही मेरे पति भी नहीं रहे थे. सास पहले ही चल बसी थीं. ससुराल के अन्य लोग जायदाद के कारण मुझे वहां टिकने नहीं देना चाहते थे. प्राण बचाकर पिता के पास आ गयी थी और तब से यहीं हूं."

उनकी जीवन गाथा सुनकर मेरा ह्रदय उनके प्रति करुणा से भर उठा. कुछ देर चुप्पी रही. कमरे में सन्नाटा रेंगता रहा.
 "थोड़ी देर आराम कर लीजिए. अभी तो कॉलेज जाने में काफी समय है." चुप्पी तोड़ते हुए वह बोलीं, "आप नानकचन्द के यहां ठहरे थे ?"
"हां ."
"सुना आपकी उससे कुछ गर्मा-गार्मी हो गयी थी."
मैं हत्प्रभ उन्हें देखता रह गया. पूछा--"आपको कैसे मालुम!"
"कुछ लोग आपस में बतिया रहे थे. उन्हीं से मालूम हुआ था. गांव ज्यादा बड़ा नहीं है. बात फैलते देर नहीं लगती."
मैंने उन्हें पूरी घटना सुना दी. उदासी के साथ वह बोली---"बड़ा नीच आदमी है यह. इसने तो मुझे तबाह कर दिया है."
"कैसे ?" मैंने चैंकते हुए पूछा.
"यह कॉलेज से लगी जो जमीन है इसमें आधी मेरी है. जिस पर इसने पिताजी की  मृत्यु के बाद जबरदस्ती कब्जा कर लिया था."
"आपने मुकदमा दायर नहीं किया  उसके विरुद्ध ?"
" सब कुछ किया, लेकिन सब जगह उस जैसे भ्रष्ट लोग ही बैठे हैं…. रिश्वत देकर उसने मुकदमा जीत लिया था।"
"आपको सरकार से अपील करनी चाहिए थी ? आप  एक ऎसे परिवार से हैं जिसके भाई ने देश के लिए....”

"कोई लाभ नहीं । क्या वहां ईमानदार लोग हैं?” कुछ देर की चुप्पी के बाद वह आगे बोली, “जो थोड़ी-सी जमीन बची है, उस पर भी वह अपना अधिकार जता रहा है। मुकदमा हाई कोर्ट में चल रहा है। आपका कोई परिचित वकील अगर इलाहाबाद में हो तो बताइये।"
“मैं बताउंगा.”

"वैसे  मेरी जिन्दगी का क्या ठिकाना ? लेकिन बेसहारा होकर तो नहीं जी सकती। मैंने सोचा है कि अगर यह जमीन बचा पायी तो मरते समय गांव के गरीबों में बांट दूंगी।"
"यह  बहुत ही अच्छा विचार है आपका।" कहते हुए मैंने घड़ी देखी। तीन बजने वाले थे। उठते हुए पूछा--"शाम  कोई बस जाती है कानपुर ?"
"चार बजे जाती है उसके बाद कोई नहीं. लेकिन आप परेशान क्यों हो रहे हैं ।सूटकेस छोड़ जाइये। कल चले जाइएगा।"
विवशता थी। परीक्षाएं छह बजे समाप्त होनी थी। अतः वह रात उन्हीं के यहां काटने का निर्णय कर मैंने सूटकेस वहीं छोड़ दिया और कॉलेज चला गया।
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इटावा वापस पहुंचकर सबसे पहले मैंने अपने मित्र राकेश को इलाहाबाद पत्र लिखा। उससे आग्रह किया कि वह  अन्नपूर्णा जी की सहायता करे. फिर एक पत्र अन्नपूर्णा जी को लिखा.  दोनों के ही उत्तर शीघ्र प्राप्त हुए. राकेश ने यथायोग्य  सहायाता करने का आश्वासन दिया था.

अन्नपूर्णा जी के प्रति मेरी श्रद्धा इतनी अधिक बढ़ गयी थी कि मैं स्वयं अपने अंदर उनकी पीड़ा झेल रहा था. कुछ दिनों बाद मुझे उनका एक और पत्र प्राप्त हुआ जिससे ज्ञात हुआ कि वह इलाहाबाद जाकर राकेश से मिल आयी थीं और राकेश ने बिना कोई खर्च लिए मुकदमे की पैरवी करना स्वीकार कर लिया था.

समय पंख लगाकर उड़ता जा रहा था। लगभग एक वर्ष बीत गया। अचानक अन्नपूर्णा जी के पत्र आने बन्द हो गये। मैंने राकेश को उनके विषय में जानकारी प्रदान करने के लिए लिखा। राकेश ने लिखा कि अन्नपूर्णा जी लगभग दो महीने से न तो उससे मिलीं और न ही उनका कोई पत्र उसे प्राप्त हुआ। उसने यह भी लिखा -- कि मुकदमा ’फाइनल स्टेज, में है और अचानक उनके मौन हो जाने सॆ उसे काफी परेशानी हो रही है। उसने विश्वास व्यक्त किया था कि वह निश्चित ही मुकदमा जीत जायेगीं। पत्र पढ़कर मैं मंभीर चिन्ता में डूब गया. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। दूसरे दिन मैंने उन्हें तार दिया। आठ दिन तक उत्तर की प्रतीक्षा करता रहा, किन्तु निराशा ही हाथ लगी. अंत में मैंने स्वयं खजुहा जाने का निर्णय किया.

जब मैं उनके घर पहुंचा, दरवाजे पर लटकते ताला को दूर से देखकर मेरा दिल बैठने लगा। अंदर-ही-अंदर आशंका घर करने लगी। मुझे उनके दरवाजे के सामने किंर्त्तव्यविमूढ़-सा खड़ा देखकर पास के मकान से निकलकर एक महिला ने पूछा, "आप किसे चाहते हैं?"

"यहां जो अन्नपूर्णा जी...."
"वह  न जाने कब की यहां से चली गयीं।"
"आप बता सकती हैं, वह कहां गयी हैं ?"
"नहीं---- मुझे ठीक से नहीं मालूम कि वह कहां गयी हैं. लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि वह शायद बनारस चली गयी हैं या वृन्दावन..."
"लेकिन क्यों....?" मैं आगे कुछ कहते-कहते रुक गया. वह महिला शायद मेरा आभिप्राय समझ गयी थीं, बोलीं---"गुण्डे रहने देते तब न रहतीं बेचारी."
मेरे सामने नानकचन्द का चेहरा घूमने लगा. लगा जैसे वह चेहरा बड़ा होता जा रहा है और उस विभत्स आकृति की चपेट में मैं भी आ गया हूं.

’अजगर तथा अन्य कहानियां’ (१९८८)

कहानी-६


साजिश के खिलाफ
रूपसिंह चन्देल

सुन्दरलाल की बात सुनकर वह ऊपर से नीचे तक सिहर उठे. क्षणभर के लिए आंखों के आगे अंधेरा छा गया. उन्होंने पत्नी की ओर देखा. उसका चेहरा भी मुरझाया हुआ था. कुर्सी में अधलेटी-सी वह भी चिन्ता की गहरी खाई में खोई हुई थी. सुन्दरलाल मेज से पत्रिका उठाकर उसके पन्ने पलटते हुए वातावरण के अनुकूल अपने को गंभीर बनाने का प्रयत्न कर रहे थे.

कुछ संयत होकर उन्होंने पुनः एक नजर पत्नी पर डाली , फिर रसोई की ओर देखा. सुनीता चाय बना रही थी. सुन्दरलाल के कमरे में कदम रखते ही उनके चेहरे के भाव देखकर ही वह समझ गए थे कि निश्चित ही उन पर दूसरा कहर बरपा होने वाला है और इसीलिए उन्होंने सुनीता को चाय बना लाने के लिए भेज दिया था. वह नहीं चाहते थे कि सुनीता, उनके और सुन्दरलाल के बीच होने वाली बातचीत सुने। उन्होंने सिर कुर्सी से  सिर टिका लिया और छत पर लगे मकड़ी के जाले को देखने लगे और सोचने लगे सुनीता के बारे में। अचानक घड़ी की टन की आवाज से उनका ध्यान भंग हुआ। साढ़े चार बजे थे। उन्होंने सुन्दरलाल की ओर देखा और बातों का सिलसिला शुरू करते हुए बुझे स्वर में बोले, "--- तो आपने फैक्ट्री वालों की तरह ही मुझे  चोर समझ लिया----बाबू सुन्दरलाल।"

"नहीं---नही----शर्मा जी, यह क्या कह रहे हैं आप ? म ---म ---- मेरे लिए तो आप वैसे ही हैं जैसे----आप मुझे बिल्कुल गलत न समझें।" दोनों हाथ हिलाते हुए सुन्दरलाल ने कहा, "वास्तविकता मैं समझता हूं। आपको झूठा ही फंसाया गया है---- वह जनरल मैनेजर परले दरजे का बदमाश है और यह लेखराम ---- लेकिन सभी तो इस बात को नहीं मानते । आखिर उड़ती हुई खबर कुन्दनलाल जी तक पहुंची होगी। उनका बड़ा लड़का भानुप्रताप आज सवेरे दौड़ा आया मेरे पास। मैने उस भले आदमी को हर तरह से समझाया, लेकिन मेरी एक भी बात उसकी जेहन में नहीं उतरी।"

"जरूर कुन्दनलाल डर गए होंगे कि अब मैं दहेज दूंगा भी या नहीं।" एक लंबी आह भरकर वह बोले और पुनः छत की ओर देखने लगे। एक बार फिर कमरे में नीरवता फैल गयी। कुछ क्षण बाद वह बोले, "सगाई करना और तोड़ देना आजकल लड़के वालों के लिए खिलवाड़-सा हो गया है, लेकिन लड़की वालों के लिए तो यह इज्जत का सवाल है---- बाबू सुन्दरलाल। कुन्दनलाल के लड़के के साथ सुनीता की शादी तय होने की बात सभी को मालूम हो चुकी है। बताओ मैं उन सबको क्या जवाब दूंगा। " उनकी आवाज भर्रा उठी। लगा जैसे मन की पीड़ा आंखों के रास्ते निकलना चाह रही है। वह चुप हो गए।
"मैं सब समझता हूं शर्मा जी और भानु को भी मैंने यही सब समझाने की कोशिश की थी, लेकिन----." कुछ कहते -कहते सुन्दरलाल रुक गए.

"हुं---- ." उन्होंने दीर्घ श्वास छोड़ी और पत्नी की ओर देखा . पत्नी अभी भी उसी प्रकार कुर्सी पर बैठी थी। मानो जड़ हो गयी हो. ’जड़ तो वह तब से ही है जब से उसने उनके मुअत्तल होने की खबर सुनी.’

"कोई उपाय निकालो सुन्दरलाल । मेरी तो अक्ल ही काम नहीं कर रही। एक के बाद एक आफतों का सिलसिला शुरू हो गया है मेरे साथ।" अत्यधिक विनीत स्वर में चेहरे पर उग आई ठूठियों पर हाथ फेरते हुए वह बोले।

"उपाय क्या बताऊं शर्मा जी। बुरे वक्त में तो अपना साया भी साथ छोड़ देता है फिर उन लोगों के साथ तो रिश्ता जोड़ने की अभी शुरुआत ही हुई थी।"

"खैर, यह भी----।" कुछ कहते-कहते वह रुक गए। सुनीता चाय ले आई थी। सुन्दरलाल की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा, "अंकल को दो बेटा, मेरी इच्छा नहीं है।"

"आपने सुबह भी नहीं पी बाबूजी---- आधा कप ही----।"

"बेटे मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं है। तुम अंकल को दो।" सुनीताकी बात उन्होंने बीच में ही काट दी और सुन्दरलाल की ओर मुखातिब होकर बोले, "सुन्दर भाई मेरे न लेने का बुरा न मानिएगा। आप लीजिए।"

नमकीन की प्लेट सुन्दरलाल की ओर बढ़ाकर सुनीता कप में चाय डालने लगी। वह पत्नी की ओर देखने लगे थे, जो अपनी गीली आंखों को पोंछते हुए दूसरे कमरे की ओर जा रही थी। सुन्दरलाल को इत्मीनान से चाय पीते देख उन्होंने पुनः कुर्सी से सिर टिका लिया और आंखें बन्द कर सोचने लगे उस दिन की उस घटना के बारे में जिसके कारण आज सुनीता की सगाई टूट गयी थी।

उस दिन से ही परिवार का सारा वातावरण बदल गया था। परिवार के सभी सदस्यों में मुर्दनी छा गई थी। सारा परिवार एक प्रकार के भयावह वातावरण में जी रहा था। यहां तक कि हर समय घर में उछल-कूद मचाने वाले सोनू और पिंकी भी उस दिन से सहमे से रहने लगे थे। वे अबोध बच्चे स्थिति की वास्तविकता समझने में भले ही असमर्थ थे, किन्तु बड़ों को उदास तथा परेशान देखकर शायद उन्होंने भी यह अनुमान लगा लिया था कि अवश्य ही कुछ अघटित हो गया है। उस दिन के बाद न ही दोनों ने उनसे टॉफी की मांग की थी और न ही घुमा लाने की जिद।

घुमाने का प्रश्न तो इसलिए भी नहीं उठता, क्योंकि वह स्वयं उस दिन के बाद एक-आध बार के अतिरिक्त घर से बाहर नहीं निकले थे। आखिर किस-किस की नजर का सामना करते वह। उससे एक दिन पहले तक जो शर्मा जी सारी बस्ती के लिए नेक और ईमानदार व्यक्ति थे, रातभर में ही वह चोर और बदमाश करार कर दिए गए थे। पच्चीस वर्षों की ईमानदारी का किला मात्र एक रात्रि के षड्यन्त्र ने ढहा दिया था. जिसकी कल्पना उन्होंने स्वप्न में भी नहीं की थी.

जिस बस्ती में उनका अच्छा-खासा प्रभाव था, अब उसी की गलियां पार कारते समय उन्हें अपने अंदर कंपकंपी-सी महसूस होने लगती है. कल तक उनके खैरख्वाह रहे अनेक चेहरे अब एकाएक उनके प्रति शंकालु हो उठे थे.
"जरूर शर्मा जी का हाथ रहा होगा इस मामले में ."

"अरे मैं तो पहले ही समझता था कि वह आदमी देखने में ही भोला दिखाई देता है. इसके तो पेट में पैर निकले ----पेट में."

बाहर जाते समय एकाध बार उन्हें उन लोगों की टिप्पणियों का भी सामना करना पड़ा, जिन्हें कभी वह अपना समझते थे. उस समय उन्हें ऎसा लगा था कि शायद उनके कदम लड़खड़ाने लगे हैं, और वह अपने को किसी प्रकार घसीट-घुसीट कर ही घर तक ला पाए थे. उसके बाद न ही उन्हें बाहर जाने की कोई आवश्यकता प्रतीत हुई और न ही मन के बोझ को हल्का करने के लिए शाम को स्टेशन की ओर घूमने जाने की बात उनके दिमाग में आई. उन्होंने अपने को पूरी तरह घर में ही बन्द कर लिया था. जब भी पत्नी थोड़ा इधर-उधर घूमने जाने के लिए कहती, वह जवाब देते, "क्या मुंह लेकर लोगों के सामने से निकलूं! झूठा इल्जाम थोपकर फैक्ट्री वालों ने इस योग्य नहीं रखा कि फिलहाल लोगों की आंखों का सामना कर सकूं." और वह बुझे से पलंग पर ढह जाया करते.

उन्होंने अर्धनिमीलित आंखों से सुन्दरलाल की ओर देखा। सुन्दरलाल को चाय पीते देखकर उन्होंने पुनः आंखें बन्द कर लीं और सोचने लगे।

’उस दिन सुबह वह दफ्तर जाने के लिए तैयार हो ही रहे थे कि एक सिपाही के साथ पुलिस इंस्पेक्टर को दरवाजे पर देखकर वह एकदम हत्प्रभ रह गए थे। और जब उन्हें यह ज्ञात हुआ था कि इंस्पेक्टर उन्हें ’फर्नेस आयल’ चोरी करने के आरोप में गिरफ्तार करने आया है,  वह अर्द्धमूर्छित से माथा पकड़कर कुर्सी पर बैठ गए थे. कमीज की बटनें बन्द करने तक का ध्यान नहीं रहा था उन्हें।

इंसपेक्टर के कई बार साथ चलने के लिए कहने पर वह किसी प्रकार उठकर लड़खड़ाते हुए उसके साथ चले गए थे। थाने पहुंचकर सारे रहस्य पर से पर्दा उठ गया था।

एक दिन पहले उन्हें दिल्ली से चालीस हजार लीटर ’फर्नेस आयल’ लाने के लिए भेजा गया था। वापस लौटने में उन्हें काफी देर हो गई थी। रात ग्यारह बजे वह फैक्ट्री पहुंचे थे। पूरे चालीस हजार लीटर ’आयल’ से भरे टैंकर स्वयं अपने सामने फैक्ट्री के अंदर करवाकर ’सिक्योरिटी ऑफिस’ में अपने हस्ताक्षर करके वह घर आ गए थे। लेकिन उन पर बीस हजार लीटर ’आयल’ बेच आने का आरोप लगाया गया था। बताया गया था कि फैक्ट्री में केवल बीस हजार लीटर ’आयल’ पहुंचा था, शेष आया ही नहीं था। हुआ यह था कि आधी रात के बाद --’इंसपेक्शन विभाग’ के सुपरवाइजर ने टैंकर से निकाले गए ’आयल’ को चेक किया था। केवल बीस हजार लीटर ’आयल’ पाकर उसने रात में ही चारों ओर टेलीफोन खटका दिए थे। तब तक टैंकर वापस जा चुके थे और उन्हें ’आयल’ बेच आने के आरोप में फंसा दिया गया था। जबकि वास्तविकता कुछ और ही थी।

उन्हें पूरे चौचीस घंटे थाने में कैद रखा गया था। चौबीस घंते मुअत्तल किए जाने के लिए पर्याप्त थे। बाद में ’इन्क्वायारी ’ के आदेश दिए गए थे।

उन्हें सिक्योरिटी गार्ड रामरिख की याद हो आयी । उनके छूटकर आने के बाद वह घर पर आया था और उन्हें दिलासा देता हुआ बोला था, "घबराना नहीं शर्मा जी होने दो इन्क्वारी। मैं आपका साथ दूंगा। मेरी ड्यूटी भी उस समय गेट पर ही थी।"

कुछ आशान्वित होते हुए उन्होंने पूछा था, "कैसे रामरिख ?"

"आपको जान-बूझकर फंसाया गया है शर्मा जी। लबालब ’फर्नेस आयल’ से भरे टैंकर आप मेरे सामने ही पैक्ट्री के अंदर करवाकर गए थे। फिर तेल गायब हुआ कैसे ?" एक रहस्य भरी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए वह बोला, "इसमें जनरल मैनेजर, बड़े बाबू लेखराम और उस --- हां--- हां बदमाश सिक्योरिटी सुपरवाइजर हरबीर दोनों का ही हाथ है. अब समझे आप ."

वह तब भी कुछ नहीं समझ पाए थे. क्योंकि कानून की दृष्ट में वह अभी भी चोर थे. वह अपनी बढ़ आयी दाढ़ी सहलाते रहे थे.

कुछ देर बाद भेद भरी दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए रामरिख आगे बोला , ’फर्नेस आयल’ पूरा निकाला ही नहीं गया था शर्मा जी। केवल बीस हजार लीटर, यानी कि आधा निकालकर शेष से भरे टैंकर वापस लौटा दिए गए थे, क्योंकि शेष बीस हजार लीटर का सौदा उन लोगों ने पहले ही किसी दूसरी कम्पनी से कर रखा होगा. .... और खुद फंसने की नौबत सिर पर आती देख उन लोगों ने आपको फंसा दिया. आपको पता है कि मुझे भी एक बार ऎसे ही फंसाने की कोशिश की थी इसी सिक्योरिटी सुपरवाइजर और लेखराम ने तांबे के तार वाले केस में जबकि तार पार करवाकर बेचने वालों से वे दोनों ही मिले हुए थे.
उन्हें मालूम था कि एक बार फैक्ट्री से कई हजार रुपये तांबे का तार चोरी गया था, जिसमें रामरिख को फंसाने की कोशिश की गई थी, लेकिन वह किसी प्रकार बच गया था। बच तो वास्तविक चोर लेखराम और हरबीर भी गये थे और फंसा दिया था फैक्ट्री के उत्तरी गेट में उस दिन तैनात दूसरे सिक्योरिटी गार्ड रघुबीर को।

"आप बिल्कुल मत घबराइए शर्मा जी।" कहकर रामरिख उठकर चला गया था। उस समय वह रामरिख को कोई उत्तर न दे पाए थे। उसके जाने के बाद केवल उसकी बातों के बारे में ही सोचते रहे थे। उस दिन से एक ही बात को न जाने कितनी बार वह सोच चुके थे, "क्या इन भ्रष्ट लोगों से लड़ना इतना आसान है, जिनके खूनी पंजे व्यवस्था के हर महत्वपूर्ण स्थान पर जमें हुए हैं----ये वर्तमान व्यवस्था का वह गलित अंग हैं जो अपने लिए ---- केवल अपने लिए राष्ट्र को भी दांव पर लगा सकते हैं---- आखिर कब तक फैक्ट्री के गरीब कर्मचारी इनकी साजिश का शिकार होते रहेंगे।" एक चुनौती भरा प्रश्न उन्हें आन्दोलित कर उठा। उनकी चिन्तन प्रक्रिया तीव्र हो गई।

"----नहीं अब इस फैक्ट्री में ऎसा कभी नहीं होने पाएगा।" वह एकाएक चीख उठे।

"शर्मा जी---- आपकी तबीयत शायद ठीक नहीं है---- मैं चलने की इजाजत चाहता हूं--- आप आराम करें।" सुन्दरलाल के शब्द सुनकर वह संभलकर बैठ गये।

"नहीं---- मैं अब बिल्कुल स्वस्थ हूं।" चेहरे पर सामान्य भाव लाते हुए वह बोले, "सुनीता की शादी कुछ दिनों के लिए और टालनी पड़ेगी---- कोई बात नहीं--- अब मैं पहले अपने विरुद्ध हुई साजिश के खिलाफ लड़ूंगा , फिर उसके बाद---- तब तक सुनीता भी एम०ए० कर लेगी----।"

सुन्दरलाल उनके इस परिवर्तन को साश्चर्य क्षणभर तक देखते रहे, फिर, "आप ठीक कह रहे हैं शर्मा जी" कहकर नमस्कार कर चले गए.

सुन्दरलाल के जाने के बाद उन्होंने उठकर शीशे के सामने जाकर अपने बाल ठीक किए. उनके चेहरे पर से कुहासा अब बिल्कुल साफ हो चुका था. अब वह अपने अंदर स्फूर्ति अनुभव कर रहे थे। उन्होंने पैरों में चप्पलें डालीं और पत्नी को आवाज दी। पत्नी के आने पर बोले, "मैं जरा रामरिख के पास जा रहा हूं---- तुम, सोनू और पिंकी को तैयार रखना , लौटकर स्टेशन की ओर घुमाने ले जाऊंगा।"
पत्नी की प्रतिक्रिया जाने बगैर वह सड़क पर आ गये। उनके कदम रामरिख के घर की ओर बढ़ने लगे थे।
’अजगर तथा अन्य कहानियां’ (१९८८)