Saturday, 10 September 2011

कहानी-६


साजिश के खिलाफ
रूपसिंह चन्देल

सुन्दरलाल की बात सुनकर वह ऊपर से नीचे तक सिहर उठे. क्षणभर के लिए आंखों के आगे अंधेरा छा गया. उन्होंने पत्नी की ओर देखा. उसका चेहरा भी मुरझाया हुआ था. कुर्सी में अधलेटी-सी वह भी चिन्ता की गहरी खाई में खोई हुई थी. सुन्दरलाल मेज से पत्रिका उठाकर उसके पन्ने पलटते हुए वातावरण के अनुकूल अपने को गंभीर बनाने का प्रयत्न कर रहे थे.

कुछ संयत होकर उन्होंने पुनः एक नजर पत्नी पर डाली , फिर रसोई की ओर देखा. सुनीता चाय बना रही थी. सुन्दरलाल के कमरे में कदम रखते ही उनके चेहरे के भाव देखकर ही वह समझ गए थे कि निश्चित ही उन पर दूसरा कहर बरपा होने वाला है और इसीलिए उन्होंने सुनीता को चाय बना लाने के लिए भेज दिया था. वह नहीं चाहते थे कि सुनीता, उनके और सुन्दरलाल के बीच होने वाली बातचीत सुने। उन्होंने सिर कुर्सी से  सिर टिका लिया और छत पर लगे मकड़ी के जाले को देखने लगे और सोचने लगे सुनीता के बारे में। अचानक घड़ी की टन की आवाज से उनका ध्यान भंग हुआ। साढ़े चार बजे थे। उन्होंने सुन्दरलाल की ओर देखा और बातों का सिलसिला शुरू करते हुए बुझे स्वर में बोले, "--- तो आपने फैक्ट्री वालों की तरह ही मुझे  चोर समझ लिया----बाबू सुन्दरलाल।"

"नहीं---नही----शर्मा जी, यह क्या कह रहे हैं आप ? म ---म ---- मेरे लिए तो आप वैसे ही हैं जैसे----आप मुझे बिल्कुल गलत न समझें।" दोनों हाथ हिलाते हुए सुन्दरलाल ने कहा, "वास्तविकता मैं समझता हूं। आपको झूठा ही फंसाया गया है---- वह जनरल मैनेजर परले दरजे का बदमाश है और यह लेखराम ---- लेकिन सभी तो इस बात को नहीं मानते । आखिर उड़ती हुई खबर कुन्दनलाल जी तक पहुंची होगी। उनका बड़ा लड़का भानुप्रताप आज सवेरे दौड़ा आया मेरे पास। मैने उस भले आदमी को हर तरह से समझाया, लेकिन मेरी एक भी बात उसकी जेहन में नहीं उतरी।"

"जरूर कुन्दनलाल डर गए होंगे कि अब मैं दहेज दूंगा भी या नहीं।" एक लंबी आह भरकर वह बोले और पुनः छत की ओर देखने लगे। एक बार फिर कमरे में नीरवता फैल गयी। कुछ क्षण बाद वह बोले, "सगाई करना और तोड़ देना आजकल लड़के वालों के लिए खिलवाड़-सा हो गया है, लेकिन लड़की वालों के लिए तो यह इज्जत का सवाल है---- बाबू सुन्दरलाल। कुन्दनलाल के लड़के के साथ सुनीता की शादी तय होने की बात सभी को मालूम हो चुकी है। बताओ मैं उन सबको क्या जवाब दूंगा। " उनकी आवाज भर्रा उठी। लगा जैसे मन की पीड़ा आंखों के रास्ते निकलना चाह रही है। वह चुप हो गए।
"मैं सब समझता हूं शर्मा जी और भानु को भी मैंने यही सब समझाने की कोशिश की थी, लेकिन----." कुछ कहते -कहते सुन्दरलाल रुक गए.

"हुं---- ." उन्होंने दीर्घ श्वास छोड़ी और पत्नी की ओर देखा . पत्नी अभी भी उसी प्रकार कुर्सी पर बैठी थी। मानो जड़ हो गयी हो. ’जड़ तो वह तब से ही है जब से उसने उनके मुअत्तल होने की खबर सुनी.’

"कोई उपाय निकालो सुन्दरलाल । मेरी तो अक्ल ही काम नहीं कर रही। एक के बाद एक आफतों का सिलसिला शुरू हो गया है मेरे साथ।" अत्यधिक विनीत स्वर में चेहरे पर उग आई ठूठियों पर हाथ फेरते हुए वह बोले।

"उपाय क्या बताऊं शर्मा जी। बुरे वक्त में तो अपना साया भी साथ छोड़ देता है फिर उन लोगों के साथ तो रिश्ता जोड़ने की अभी शुरुआत ही हुई थी।"

"खैर, यह भी----।" कुछ कहते-कहते वह रुक गए। सुनीता चाय ले आई थी। सुन्दरलाल की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा, "अंकल को दो बेटा, मेरी इच्छा नहीं है।"

"आपने सुबह भी नहीं पी बाबूजी---- आधा कप ही----।"

"बेटे मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं है। तुम अंकल को दो।" सुनीताकी बात उन्होंने बीच में ही काट दी और सुन्दरलाल की ओर मुखातिब होकर बोले, "सुन्दर भाई मेरे न लेने का बुरा न मानिएगा। आप लीजिए।"

नमकीन की प्लेट सुन्दरलाल की ओर बढ़ाकर सुनीता कप में चाय डालने लगी। वह पत्नी की ओर देखने लगे थे, जो अपनी गीली आंखों को पोंछते हुए दूसरे कमरे की ओर जा रही थी। सुन्दरलाल को इत्मीनान से चाय पीते देख उन्होंने पुनः कुर्सी से सिर टिका लिया और आंखें बन्द कर सोचने लगे उस दिन की उस घटना के बारे में जिसके कारण आज सुनीता की सगाई टूट गयी थी।

उस दिन से ही परिवार का सारा वातावरण बदल गया था। परिवार के सभी सदस्यों में मुर्दनी छा गई थी। सारा परिवार एक प्रकार के भयावह वातावरण में जी रहा था। यहां तक कि हर समय घर में उछल-कूद मचाने वाले सोनू और पिंकी भी उस दिन से सहमे से रहने लगे थे। वे अबोध बच्चे स्थिति की वास्तविकता समझने में भले ही असमर्थ थे, किन्तु बड़ों को उदास तथा परेशान देखकर शायद उन्होंने भी यह अनुमान लगा लिया था कि अवश्य ही कुछ अघटित हो गया है। उस दिन के बाद न ही दोनों ने उनसे टॉफी की मांग की थी और न ही घुमा लाने की जिद।

घुमाने का प्रश्न तो इसलिए भी नहीं उठता, क्योंकि वह स्वयं उस दिन के बाद एक-आध बार के अतिरिक्त घर से बाहर नहीं निकले थे। आखिर किस-किस की नजर का सामना करते वह। उससे एक दिन पहले तक जो शर्मा जी सारी बस्ती के लिए नेक और ईमानदार व्यक्ति थे, रातभर में ही वह चोर और बदमाश करार कर दिए गए थे। पच्चीस वर्षों की ईमानदारी का किला मात्र एक रात्रि के षड्यन्त्र ने ढहा दिया था. जिसकी कल्पना उन्होंने स्वप्न में भी नहीं की थी.

जिस बस्ती में उनका अच्छा-खासा प्रभाव था, अब उसी की गलियां पार कारते समय उन्हें अपने अंदर कंपकंपी-सी महसूस होने लगती है. कल तक उनके खैरख्वाह रहे अनेक चेहरे अब एकाएक उनके प्रति शंकालु हो उठे थे.
"जरूर शर्मा जी का हाथ रहा होगा इस मामले में ."

"अरे मैं तो पहले ही समझता था कि वह आदमी देखने में ही भोला दिखाई देता है. इसके तो पेट में पैर निकले ----पेट में."

बाहर जाते समय एकाध बार उन्हें उन लोगों की टिप्पणियों का भी सामना करना पड़ा, जिन्हें कभी वह अपना समझते थे. उस समय उन्हें ऎसा लगा था कि शायद उनके कदम लड़खड़ाने लगे हैं, और वह अपने को किसी प्रकार घसीट-घुसीट कर ही घर तक ला पाए थे. उसके बाद न ही उन्हें बाहर जाने की कोई आवश्यकता प्रतीत हुई और न ही मन के बोझ को हल्का करने के लिए शाम को स्टेशन की ओर घूमने जाने की बात उनके दिमाग में आई. उन्होंने अपने को पूरी तरह घर में ही बन्द कर लिया था. जब भी पत्नी थोड़ा इधर-उधर घूमने जाने के लिए कहती, वह जवाब देते, "क्या मुंह लेकर लोगों के सामने से निकलूं! झूठा इल्जाम थोपकर फैक्ट्री वालों ने इस योग्य नहीं रखा कि फिलहाल लोगों की आंखों का सामना कर सकूं." और वह बुझे से पलंग पर ढह जाया करते.

उन्होंने अर्धनिमीलित आंखों से सुन्दरलाल की ओर देखा। सुन्दरलाल को चाय पीते देखकर उन्होंने पुनः आंखें बन्द कर लीं और सोचने लगे।

’उस दिन सुबह वह दफ्तर जाने के लिए तैयार हो ही रहे थे कि एक सिपाही के साथ पुलिस इंस्पेक्टर को दरवाजे पर देखकर वह एकदम हत्प्रभ रह गए थे। और जब उन्हें यह ज्ञात हुआ था कि इंस्पेक्टर उन्हें ’फर्नेस आयल’ चोरी करने के आरोप में गिरफ्तार करने आया है,  वह अर्द्धमूर्छित से माथा पकड़कर कुर्सी पर बैठ गए थे. कमीज की बटनें बन्द करने तक का ध्यान नहीं रहा था उन्हें।

इंसपेक्टर के कई बार साथ चलने के लिए कहने पर वह किसी प्रकार उठकर लड़खड़ाते हुए उसके साथ चले गए थे। थाने पहुंचकर सारे रहस्य पर से पर्दा उठ गया था।

एक दिन पहले उन्हें दिल्ली से चालीस हजार लीटर ’फर्नेस आयल’ लाने के लिए भेजा गया था। वापस लौटने में उन्हें काफी देर हो गई थी। रात ग्यारह बजे वह फैक्ट्री पहुंचे थे। पूरे चालीस हजार लीटर ’आयल’ से भरे टैंकर स्वयं अपने सामने फैक्ट्री के अंदर करवाकर ’सिक्योरिटी ऑफिस’ में अपने हस्ताक्षर करके वह घर आ गए थे। लेकिन उन पर बीस हजार लीटर ’आयल’ बेच आने का आरोप लगाया गया था। बताया गया था कि फैक्ट्री में केवल बीस हजार लीटर ’आयल’ पहुंचा था, शेष आया ही नहीं था। हुआ यह था कि आधी रात के बाद --’इंसपेक्शन विभाग’ के सुपरवाइजर ने टैंकर से निकाले गए ’आयल’ को चेक किया था। केवल बीस हजार लीटर ’आयल’ पाकर उसने रात में ही चारों ओर टेलीफोन खटका दिए थे। तब तक टैंकर वापस जा चुके थे और उन्हें ’आयल’ बेच आने के आरोप में फंसा दिया गया था। जबकि वास्तविकता कुछ और ही थी।

उन्हें पूरे चौचीस घंटे थाने में कैद रखा गया था। चौबीस घंते मुअत्तल किए जाने के लिए पर्याप्त थे। बाद में ’इन्क्वायारी ’ के आदेश दिए गए थे।

उन्हें सिक्योरिटी गार्ड रामरिख की याद हो आयी । उनके छूटकर आने के बाद वह घर पर आया था और उन्हें दिलासा देता हुआ बोला था, "घबराना नहीं शर्मा जी होने दो इन्क्वारी। मैं आपका साथ दूंगा। मेरी ड्यूटी भी उस समय गेट पर ही थी।"

कुछ आशान्वित होते हुए उन्होंने पूछा था, "कैसे रामरिख ?"

"आपको जान-बूझकर फंसाया गया है शर्मा जी। लबालब ’फर्नेस आयल’ से भरे टैंकर आप मेरे सामने ही पैक्ट्री के अंदर करवाकर गए थे। फिर तेल गायब हुआ कैसे ?" एक रहस्य भरी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए वह बोला, "इसमें जनरल मैनेजर, बड़े बाबू लेखराम और उस --- हां--- हां बदमाश सिक्योरिटी सुपरवाइजर हरबीर दोनों का ही हाथ है. अब समझे आप ."

वह तब भी कुछ नहीं समझ पाए थे. क्योंकि कानून की दृष्ट में वह अभी भी चोर थे. वह अपनी बढ़ आयी दाढ़ी सहलाते रहे थे.

कुछ देर बाद भेद भरी दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए रामरिख आगे बोला , ’फर्नेस आयल’ पूरा निकाला ही नहीं गया था शर्मा जी। केवल बीस हजार लीटर, यानी कि आधा निकालकर शेष से भरे टैंकर वापस लौटा दिए गए थे, क्योंकि शेष बीस हजार लीटर का सौदा उन लोगों ने पहले ही किसी दूसरी कम्पनी से कर रखा होगा. .... और खुद फंसने की नौबत सिर पर आती देख उन लोगों ने आपको फंसा दिया. आपको पता है कि मुझे भी एक बार ऎसे ही फंसाने की कोशिश की थी इसी सिक्योरिटी सुपरवाइजर और लेखराम ने तांबे के तार वाले केस में जबकि तार पार करवाकर बेचने वालों से वे दोनों ही मिले हुए थे.
उन्हें मालूम था कि एक बार फैक्ट्री से कई हजार रुपये तांबे का तार चोरी गया था, जिसमें रामरिख को फंसाने की कोशिश की गई थी, लेकिन वह किसी प्रकार बच गया था। बच तो वास्तविक चोर लेखराम और हरबीर भी गये थे और फंसा दिया था फैक्ट्री के उत्तरी गेट में उस दिन तैनात दूसरे सिक्योरिटी गार्ड रघुबीर को।

"आप बिल्कुल मत घबराइए शर्मा जी।" कहकर रामरिख उठकर चला गया था। उस समय वह रामरिख को कोई उत्तर न दे पाए थे। उसके जाने के बाद केवल उसकी बातों के बारे में ही सोचते रहे थे। उस दिन से एक ही बात को न जाने कितनी बार वह सोच चुके थे, "क्या इन भ्रष्ट लोगों से लड़ना इतना आसान है, जिनके खूनी पंजे व्यवस्था के हर महत्वपूर्ण स्थान पर जमें हुए हैं----ये वर्तमान व्यवस्था का वह गलित अंग हैं जो अपने लिए ---- केवल अपने लिए राष्ट्र को भी दांव पर लगा सकते हैं---- आखिर कब तक फैक्ट्री के गरीब कर्मचारी इनकी साजिश का शिकार होते रहेंगे।" एक चुनौती भरा प्रश्न उन्हें आन्दोलित कर उठा। उनकी चिन्तन प्रक्रिया तीव्र हो गई।

"----नहीं अब इस फैक्ट्री में ऎसा कभी नहीं होने पाएगा।" वह एकाएक चीख उठे।

"शर्मा जी---- आपकी तबीयत शायद ठीक नहीं है---- मैं चलने की इजाजत चाहता हूं--- आप आराम करें।" सुन्दरलाल के शब्द सुनकर वह संभलकर बैठ गये।

"नहीं---- मैं अब बिल्कुल स्वस्थ हूं।" चेहरे पर सामान्य भाव लाते हुए वह बोले, "सुनीता की शादी कुछ दिनों के लिए और टालनी पड़ेगी---- कोई बात नहीं--- अब मैं पहले अपने विरुद्ध हुई साजिश के खिलाफ लड़ूंगा , फिर उसके बाद---- तब तक सुनीता भी एम०ए० कर लेगी----।"

सुन्दरलाल उनके इस परिवर्तन को साश्चर्य क्षणभर तक देखते रहे, फिर, "आप ठीक कह रहे हैं शर्मा जी" कहकर नमस्कार कर चले गए.

सुन्दरलाल के जाने के बाद उन्होंने उठकर शीशे के सामने जाकर अपने बाल ठीक किए. उनके चेहरे पर से कुहासा अब बिल्कुल साफ हो चुका था. अब वह अपने अंदर स्फूर्ति अनुभव कर रहे थे। उन्होंने पैरों में चप्पलें डालीं और पत्नी को आवाज दी। पत्नी के आने पर बोले, "मैं जरा रामरिख के पास जा रहा हूं---- तुम, सोनू और पिंकी को तैयार रखना , लौटकर स्टेशन की ओर घुमाने ले जाऊंगा।"
पत्नी की प्रतिक्रिया जाने बगैर वह सड़क पर आ गये। उनके कदम रामरिख के घर की ओर बढ़ने लगे थे।
’अजगर तथा अन्य कहानियां’ (१९८८)

No comments:

Post a Comment